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महंगाई – शोभा शर्मा की हिंदी कविता

एक दिन मुझे महंगाई मिली,उसका इठलाता यौवनउफान पर जवानी देखकरमई दांग रह गईमैंने उसे कभीबचपन में देखा था,जब मैंरुपया लीटर दूधपांच रुपया किलोसेब लाया करती थी.

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Mahgai - Hindi Poem by Shobha Sharma

एक दिन मुझे महंगाई मिली,

उसका इठलाता यौवन

उफान पर जवानी देखकर

मैं दंग रह गई

मैंने उसे कभी

बचपन में देखा था,

जब मैं

रुपया लीटर दूध

पांच रुपया किलो

सेब लाया करती थी,

तब ये महंगाई

फटे हाल अधनंगी रहती

कोई इसे न जानता

न पहचानता था,

लेकिन

आज हर कोई

इसे अवाक् देखता है

मैंने महंगाई की

जवानी का राज

उससे ही पूछा

वह तपाक से बोली

मेरी जवानी का राज

जानना चाहती हो तो

उन अमीरों की

कोठियों में जाओ

जहां मैं नाचती हूँ

पैसों के बल पर

उनके तलुए चाटती हूँ

हर रोज नै जवान बनकर

निकलती हूँ.

तुम जैसे

मुझे छूना तो दूर

देखना भी पसंद नहीं करते

इसलिए

तुम्हें मैं

जवान नजर आती हूँ,

गरीबों को तो मैं,

बिलकुल नहीं भाती हूँ

मैं उसका उत्तर सुनकर

चुप रह गयी

सोचती रह गयी, सोचती रह गयी

 

साभार: शोभा शर्मा, सहारनपुर

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