सुख और दुःख – बस यही तो है जिंदगी

इस कृषि प्रधान भारत देश को स्वतंत्र हुए साठ साल से भी ज्यादा हो गए हैं लेकिन किसानों की दशा वहीं की वहीं है. किसान तब भी कर्ज में डूबा था और अब भी कर्ज में डूबा है, पहले साहूकारों का, और अब खाद बीज वालों और आढ़तियों का.

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हम सब जानते हैं, जिंदगी के दो पहलु होते हैं – सुख और दुःख.

मैंने इस बुजुर्ग आदमी को एक रेलवे स्टेशन पर देखा, जो अपनी ट्रेन आने का इन्तजार कर रहा था. उसके साथ में दो सुन्दर घोड़े के खिलौने थे. जाहिर है वो उसके पोते पोतियों के लिए होंगे.

जब वह घर पहुंचेगा तो उसके पोते पोती खिलौने पाकर ख़ुशी से झूम उठेंगे, लेकिन वो बच्चे उस बुजुर्ग की पीड़ा को नहीं समझेंगे.

जैसाकि आप इस फोटो में देख रहे हैं वो जरूर एक किसान होगा, जो पूरी जिंदगी अनाज उगाने में व्यतीत कर देता है लेकिन बदले में उसे मिलते हैं नाम मात्र के पैसे.

इस कृषि प्रधान भारत देश को स्वतंत्र हुए साठ साल से भी ज्यादा हो गए हैं लेकिन किसानों की दशा वहीं की वहीं है. किसान तब भी कर्ज में डूबा था और अब भी कर्ज में डूबा है, पहले साहूकारों का, और अब खाद बीज वालों और आढ़तियों का.

मुझे याद है, जब अनाज पैदा होता था तो उसका कुछ हिस्सा अगली फसल के बीज के लिए रख दिया जाता था. पर अब उपज बढ़ाने के चक्कर में हाइब्रिड बीजों का इस्तेमाल बढ़ता गया स्थिति वहीं की वहीं रह गयी. अब अगली फसल के लिए दस गुने दाम पर हाइब्रिड बीज खरीदो क्यूंकि इन हाइब्रिड अनाज के बीजों को खाया तो जा सकता है पर दोबारा उगाया नहीं जा सकता है.

अब किसान को इतने महंगे बीज और खाद खरीदने के लिए खाद बीज वालों से उधार करना पड़ता है. जब फसल तैयार होती है तो किसानों को जल्दी ही उसे बेचने पड़ता है ताकि उधार चुकाकर अगली फसल की तयारी की जा सके. इस समय अनाज के दाम काम होते हैं और इसका फायदा आढ़ती उठते हैं जो काम कीमत पर फसल खरीदकर स्टॉक में रख लेते हैं और जब कीमत बढ़ती है तब बेचते हैं.

यह चक्र किसान के जीवन में जिंदगी भर चलता है. सूखा हो बाढ़ सारा रिस्क भी किसान का ही. अब इस देश का भाग्य विधाता फांसी न लगाए तो और क्या करे.

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