हुनर की बात करें तो क्या हमारे देश में हुनर की कमी है? हम ओलम्पिक जैसी प्रतियोगिताओं में क्यों पदक के लिए पलकें बिछाये रहते हैं? जबकि होनहार रोजी रोटी के चक्कर में सडकों पर अपना हुनर दिखाने को मजबूर हैं.
https://www.youtube.com/watch?v=Bfs6ZJIMalw

हुनर की बात करें तो क्या हमारे देश में हुनर की कमी है? हम ओलम्पिक जैसी प्रतियोगिताओं में क्यों पदक के लिए पलकें बिछाये रहते हैं? जबकि होनहार रोजी रोटी के चक्कर में सडकों पर अपना हुनर दिखाने को मजबूर हैं.
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भारत एक ऐसा देश है जहां पर पुत्र प्राप्ति के लोग न जाने क्या क्या करते हैं और पुत्री को बोझ की तरह देखते हैं, वहीं राजस्थान के पिपलांत्री नामक गाँव में पुत्री जन्म को एक उत्सव की तरह मनाते हैं और उसे यादगार बनाने के लिए 111 फलदार वृक्षों का रोपण करते हैं. इस गाँव का यह लड़की बचाओ अभियान अपनी तरह का अनूठा है और पूरी दुनिया के लिए अनुकरणीय है.
इस गाँव के लोग पुत्री जन्म के समय 21000 रुपये और परिवार द्वारा 10000 रुपये (कुल 31000 रुपये) 20 साल के लिए फिक्स डिपॉजिट करते हैं ताकि शादी के लायक होने पर पैसे की कमी आड़े न आये.

साथ ही लड़की के माता पिता द्वारा एक एफिडेविट भी साइन कराया जाता है जिसमे लड़की की उचित शिक्षा, और जब तक उम्र न हो तब तक शादी न करने और लड़की के जन्म के समय लगाए गए पौधों की उचित देख रेख करना आवश्यक है.

इसलिए यहां के लोग सिर्फ पेड़ लगाते भर ही नहीं हैं बल्कि उनकी उचित देख भाल भी करते हैं. पेड़ों को दीमक आदि से बचाने के लिए पेड़ों के आस पास एलो-वेरा (घृतकुमारी) के पौधे भी लगाते हैं. ये पेड़ -पौधे और खासकर एलो-वेरा यहां के कई परिवारों के लिए जीविका के साधन भी बन गए हैं.
राखी के दिन इस गाँव में अजब माहौल होता है, राखी के दिन लडकियां पौधों को राखी बांधती हैं.
यह अपने आप में अनूठी परंपरा इस गाँव के श्याम सुन्दर पालीवाल ने शुरू की थी जब उनकी पुत्री छोटी उम्र में ही चल बसी थी. पिछले 6 सालों में यहां पर लगभग 2.5 लाख से ज्यादा पौधे लगाए जा चुके हैं.

गाँव वालों का कहना है की यहां पर पिछले 7-8 सालों से कोई भी पुलिस केस नहीं हुआ है.
आखिर में, इस गाँव की परंपरा सिर्फ इस गाँव तक ही न रहकर पूरे देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में होनी चाहिए. आओ हम सब इस परम्परा का हिस्सा बने और पूरी धरती को हरा भरा बनाएं.
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“मंदिर-मस्जिद दाढ़ी चोटी, काट रहे बोटी-बोटी
बांट रहे हैं हम बच्चों को, छीन रहे हैं सबकी रोटी।।”
भारत विश्व में अकेला ऐसा धर्मनिरपेक्ष देश है, जहां सभी धर्मों का सम्मान और महत्व है। धर्मनिरपेक्ष शब्द संविधान के 1976 में हुए 42वें संशोधन अधिनियम द्वारा प्रस्तावना में जोड़ा गया। यह संशोधन सभी धर्मों की समानता और धार्मिक सहिष्णुता सुनिश्चित करता है। भारत में हर व्यक्ति को अपने पसन्द के किसी भी धर्म की उपासना, पालन और प्रचार करने का अधिकार है। ऐसे तमाम धार्मिक अधिकार दिए गए हैं, लेकिन कहीं न कहीं धार्मिक अधिकारों का हनन भी हुआ है, जिसे हम सांप्रदायिकता का नाम भी दे सकते हैं।
देश के 1947 में विभाजन पर भड़के दंगों ने कई लाख लोगों के घरों का उजाड़ दिया। लोगों ने इसे अपनी नीयती मानकर मन को समझा लिया क्योंकि देश भारत-पाकिस्तान के रूप में बंट गया था। फिर से आपसी भाइचारे की नींव डलने लगी थी, देश विकास की ओर अग्रसर होने को तैयार था, लेकिन कहते हैं न कि जख्म कभी न कभी तो हरे हो ही जाते हैं, बस उनको कुरेदने वाले शख्स चाहिए।
देश में आजादी के बाद से लेकर अब तक न जाने कितनी बार देश के किसी न किसी हिस्से में किसी न किसी कारण से दंगे हुए हैं। आखिर क्यों होते है दंगे? इसका जवाब हमें पुराने बीते सालों में हुए दंगों से मिलता है। देश में पहला सांप्रदायिक दंगा 1961 में मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में हुआ। उसके बाद से आज तक दंगों की झड़ी सी लग गयी-बात चाहे 1969 में गुजरात दंगों की हो, 1984 में सिख विरोधी हिंसा की हो, 1987 में मेरठ के दंगों की हो,1989 में भागलपुर दंगों की हो, 2002 में गुजरात दंगों की हो, 2008 में कंधमाल की हिंसा हो या हाल ही में असम की हो, जिसमें सात दिनों में जारी हिंसा में करीब दो लाख लोगों ने घर छोड़ा या मुजफ्फरनगर दंगों की हो, जो लड़की के साथ छेड़छाड़ के मुद्दे से शुरू हुआ और दंगों के रूप में सामने आया। हाल ही में गोहत्या के मामले पर विवाद शुरू हो गया है। जिसे लेकर दो समुदाय फिर से आमने-सामने हैं। इसकी शुरूआत मुंबई में भाजपा-शिवसेना गठबंधन सरकार की ओर से गोश्त की बिक्री पर प्रतिबन्ध लगाने से हुई। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने 1932 के रनबीर पैनल कोड के गोमांस प्रतिबन्धित कानून को कड़ाई से लागू करने के निर्देश दिए हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के इस फैसले पर दो महीने तक के लिए रोक लगा दी है।
विकास का एजेंडा हमें 2014 के लोकसभा चुनाव से देखने को मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर देश में तनाव बढ़ता जा रहा है। ‘मेक इन इंडियाÓ,’डिजिटल इंडियाÓ के नारों ने जो जोर विकास के एजेंडे पर दिया था, इस मुद्दे ने इसे पीछे छोड़ दिया है। राजनेता लोगों की संवेदनाओं से खेलकर अपना वोट बैंक तैयार करने में लगे हैं। इसे तब और ज्यादा तूल दिया, जब ग्रेटर नोएडा के दादरी के बिसाहड़ा गांव के व्यक्ति इकलाख की गोमांस रखने और खाने की अफवाह के कारण पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। उसके पुत्र को भी घायल कर दिया। जहां नेता राजनैतिक करियर संवारने के लिए भड़काऊ भाषण दे रहे हैं। वहीं कुछ मुस्लिम नेताओं ने इस विवाद को शांति से खत्म करने की कोशिश और गोकशी पर कानून बनाने के लिए भी सरकार से अपील की है।
राष्ट्र्रपति प्रणब मुखर्जी,प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, और कई नेताओं ने इस हत्या की निंदा की है और सहिष्णुता और सौहार्द की मीठी बोली को देश का गौरव बता भाइचारे का संदेश दिया है। पूर्व जस्टिस मार्कण्डेय काटजू सहित साहित्यकारों ने भी अपनी भावना प्रकट की है।
कई साहित्यकारों ने इस घटना के विरोध में खुद को दिए गए पुरस्कारों को लौटा दिया है। परंतु देश के मीडिया ने इस विवाद को जरूरत से ज्यादा तूल देना शुरु कर दिया है, जो उनकी टीआरपी के लिए सुखद हो सकता है। लेकिन देश के लिए दु:खद बात है। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने भी इस हत्या की कड़ी निंदा की है और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी इस मुद्दे ने जोर पकड़ा हुआ है। यूपीए-2 की सरकार ने दंगा निरोधक कानून को साल 2011 में अन्तिम रूप दे दिया था। इस विधेयक के मसौदे के अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि देश में सांप्रदायिक हिंसा पर नियन्त्रण पाने का एक महत्वपूर्ण, गंभीर व प्रभावी प्रयास होगा। विधेयक राष्ट्रीय एकता और सांप्रदायिक सौहार्द को मजबूत करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। यह अभी राज्यसभा में लम्बित है। सभी देश और खुद का विकास चाहते हैं, लेकिन अफवाहों से खेलते देश का नहीं, जहां ये नारा दिया जाए-
“लगाया था जो उसने पेड़ कभी, अब वह फल देने लगा, मुबारक हो हिन्दुस्तान में, अफवाह के नाम पे कत्ल होने लगा”
अब यह निर्णय देश की जनता के साथ ही लोकतंत्र के भावी नेताओं के लिए भी जरूरी हो गया है- विकास किसका, देश या सांप्रदायिकता का?
लेखक: वैशाली पाराशर

भारत के रॉकेट चंद्रमा पर पहुँच गए हैं, बुलेट ट्रेन चलने वाली है, विकास की ओर चार कदम चलकर विकसित देश का तमगा भी मिलने वाला है. लेकिन क्या यही विकास है?
रांची, मरीज पालमती देवी, हाथों में पट्टी बंधी हुई, बिना प्लेट के फर्श पर खाना खाती हुई, क्या दोष है? गरीबी या नीची जाति या फिर संवेदनहीनता?
सरकारी अस्पताल “रिम्स” के हड्डी रोग वॉर्ड में एडमिट पालमती देवी के पास अपनी प्लेट नहीं थी. प्लेट मांगने पर अस्पताल के रसोईकर्मियों ने प्लेट की कमी बताते हुए प्लेट देने से मना कर दिया. इसके बाद वार्डबॉय ने मरीज से ही फर्श साफ़ कराया और चावल और सब्जी फर्श पर ही रख दी. गरीबी की मारी पालमती देवी फर्श पर ही खाना खाने को मजबूर हुई.
अभी कुछ दिन पहले ही दाना मांझी के साथ हुई घटना ने दुनिया के सामने देश का सिर नीचा कर दिया था, अब फिर से अस्पतालों की संवेदनहीनता सामने आयी है.
क्या यही देश का विकास है? देश के किसान और गरीबों की कोई सुनने वाला है भी या नहीं? भारत माता और गौ माता के बीच में हम सब अपनी माताओं को शायद भूल ही गए हैं.
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गोवर्धन पर्वत का हिन्दू धर्म में बहुत ही अधिक महत्त्व है. इसकी परिक्रमा करने से सभी मुरादें पूरी हो जाती हैं. 21 किलोमीटर की गोवर्धन परिक्रमा (Govardhan Parikrama) को लोग नंगे पाँव पूरा करते हैं तो कुछ लोग लोट – लोट कर इसकी परिक्रमा लगाते हैं. यहां परिक्रमा लगाने का कोई नियत समय नहीं है. लोग साल के 365 दिन यहां परिक्रमा लगाते हैं लेकिन हर महीने की पूर्णमासी को यहाँ बेशुमार भीड़ होती है.

कहा जाता है की गोवर्धन पर्वत (Govardhan Parvat) तिल तिल करके घट रहा है. पांच हजार साल पहले यह पर्वत 30 हजार मीटर ऊंचा हुआ करता था लेकिन अब इसकी ऊँचाई केवल 30 मीटर ही रह गयी है.

यहां आने वाले लोग गिरिराज जी (Giriraj Ji) के मंदिर में साक्षी गोपाल जी के दर्शन करके अपनी यात्रा शुरू करते हैं.

श्रीराधा-गोविंद मंदिर (Shri Radha Govind Mandir): इस मंदिर का निर्माण श्रीकृष्ण जी के पोते ने करवाया था. यहीं पर गोविन्द कुंड भी है.
चूतड़ टेका (Chutar Teka):

परिक्रमा मार्ग पर अनेकों कुंड हैं जहां पर श्री कृष्ण (Shri Krishna) ने लीलाएं की थी. राधा कुंड (Radha Kund), श्याम कुंड (Shyam Kund), मानसी गंगा (Mansi Ganga) और कुसुम सरोवर (Kusum Sarovar) आदि मुख्य कुंड हैं.

राधा कुंड: इस कुंड को राधारानी ने अपने कंगन से खोदकर बनाया था. इस कुंड में स्नान करने से गौहत्या का पाप धुल जाता है.

श्याम कुंड: कहा जाता है श्रीकृष्ण ने गौहत्या का पाप दोने के लिए अपनी छड़ी से यह कुंड बनाया था.

श्रीकृष्ण पर गौहत्या का पाप: श्रीकृष्ण को मारने के लिए कंस ने अरिष्ठासुर नाम के एक असुर को भेजा था. उस समय बाल कृष्ण गाय चराने गए हुए थे तो उस असुर ने बैल का रूप धरके गायों के झुण्ड में शामिल हो गया. लेकिन श्रीकृष्ण ने उसे पहचान लिया और उसका वध कर दिया. लेकिन वह असुर चूँकि बैल के रूप में था तो श्रीकृष्ण पर गौहत्या का पाप लगा. इसके बाद श्रीकृष्ण राधारानी से मिले और उनको छू लिया. तो राधारानी भी इस पाप की भागिदार हो गयीं.

इस गौहत्या के पाप को दूर करने के लिए राधारानी ने अपने कड़े से राधा कुंड और श्रीकृष्ण ने अपनी छड़ी से श्याम कुंड का निर्माण किया. कहा जाता है इन दोनों कुंड में स्नान करने से सभी तीर्थों का पुण्य मिलता है, क्योंकि इन दोनों कुंड में सभी तीर्थ विराजमान हैं.

मानसी गंगा: पहले इसका विस्तार 6 किलोमीटर में था पर अब यह सिमटकर थोड़ी सी रह गयी है. कहा जाता है गोवर्धन के अभिषेक के लिए इतने गंगाजल को लाने की समस्या के चलते श्रीकृष्ण ने गंगा को ही गोवर्धन पर्वत पर उतार लिया था. इसलिए इसका नाम मानसी गंगा पड़ा.

गोवर्धन पर्वत का निर्माण: क्या आपको पता है की गोवर्धन पर्वत का निर्माण कैसे हुआ? अगर नहीं तो हम आपको बताते हैं.

यह कहानी श्री राम (Shri Ram) के समय की है. जब श्री राम सीता माँ को खोजते हुए समुद्र के किनारे पहुंचे तो वहाँ पर पल बनाने के लिए पत्थरों की जरूरत पड़ी. अतः हनुमान जी द्रोणगिरि पर्वत के पास गए. लेकिन द्रोणगिरि ने अपने वृद्धावस्था के बारे में बताया और अपने पुत्र गिरिराजजी या गोवर्धन पर्वत और रत्नागिरी पर्वत को साथ ले जाने के लिए कहा. हनुमान जी गिरिराज पर्वत को समुद्र के किनारे ले जाने के लिए निकल पड़े लेकिन रास्ते में उन्हें सूचना मिली की निर्माण कार्य पूरा हो गया है और अब पत्थरों की आवश्यकता नहीं है तो श्री हनुमान जी ने गिरिराज जी को गोवर्धन में स्थापित कर दिया.

लेकिन तब गिरिराजजी ने हनुमान से अपनी भगवान् श्रीराम से मिलने की इच्छा के बारे में बताया तो हनुमान जी ने कहा की द्वापर युग में भगवान् श्रीकृष्ण के रूप में आकर उनसे मिलेंगे.

चूतड़ टेका (Chutad Teka): गिरिराजजी को गोवर्धन में स्थापित करने के बाद हनुमान जी ने यहीं पर आराम किया था तो इस स्थान का नाम चूतड़ टेका पड गया. लेकिन एक और कथा के अनुसार जब श्रीकृष्ण ने इंद्र के क्रोध को गोवर्धन पर्वत उठाकर शांत किया था तो इसके बाद वो चूतड़ टेका पर ही बैठे थे.





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दो खुशखबरी:
पहले साक्षी ने कांस्य जीत फिर सिंधु ने रजत, इसके बाद हुई इनामों की बौछार, कितना? ये सोच कर अचम्भा होता है, कोई 5 करोड़ दे रहा है तो कोई 2 करोड़, कोई BMW दे रहा है तो कोई 1000 गज का प्लाट, और साथ में सरकारी नौकरी.
खैर ये अच्छी बात है जिसने देश का नाम रोशन किया हो उन्हें इनाम तो मिलना ही चाहिए.
दो बुरी खबरें:
ओपी जायशा – रियो ओलम्पिक में 42.195 किलोमीटर की मैराथन में कोई पानी देने वाला तक नहीं, 2 घंटे 47.19 सेकंड में रेस ख़त्म करने के बाद बेहोश होकर गिरी. 7 बोतल ग्लूकोज चढाने के बाद होश आया.
क्या ऐसे ही पदक उम्मीद करेगा भारत?

फोटो साभार: http://www.dnaindia.com/
पूजा कुमारी – पटियाला में राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी पूजा कुमारी ने गरीबी से तंग आकर ख़ुदकुशी कर ली. और अब इस खबर पर लीपापोती होगी, कुछ पैसे दिए जाएंगे और मामला ख़तम. सब कुछ पुराने ढर्रे पर. लेकिन राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी को सरकारी मदद तो छोड़िये पढ़ने के लिए होस्टल तक नहीं मिला, प्राइवेट कमरा लेने में असमर्थ वो रोज किराया खर्च कर कॉलेज भी नहीं आ सकती थी. क्या सोचकर उसने फांसी लगाई होगी?
अब जरा गौर फरमाइए यही रकम अगर खिलाड़ियों को तैयार करने में लगाईं जाती तो शायद नजारा कुछ और होता. खर्च मिल जाता तो पूजा शायद राष्ट्रीय से अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बन जाती और शायद इस १३० करोड़ की आबादी वाले देश में हजारों ओलम्पिक खिलाड़ी ऐसे मिल जाते जो पक्का पदकों के अम्बार लगा देते.
जरा नजर डालते हैं कौन सा देश अपने खिलाड़ियों पर कितना खर्च करते हैं:
अमेरिका: खर्च (एक खिलाड़ी पर): 74 करोड़, पदक जीतने पर इनाम: 16 लाख
ब्रिटेन: खर्च (एक खिलाड़ी पर): 48 करोड़, पदक जीतने पर इनाम: कुछ नहीं
चीन: खर्च (एक खिलाड़ी पर): 47 करोड़, पदक जीतने पर इनाम: 24 लाख
भारत: खर्च (सभी 118 खिलाड़ियों पर): 160 करोड़, पदक जीतने पर इनाम: 75 लाख – स्वर्ण पर, 50 लाख – रजत पर, 30 लाख – कांस्य पर
इसके अलावा प्रदेश सरकारें, स्वयंसेवी संगठन और अमीर माननीय अपने स्टार से करोड़ों रुपये पदक जीतने के बाद देते हैं.
सच्चाई: भारत में बहुत सारे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी गरीबी में जी रहे हैं.
आशा रॉय – एक समय का खाना भी नसीब नहीं.
सीता साहू – गोलगप्पे बेंच रही है.

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शांति देवी – सब्जियां बेंच रही है.

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शांति – मैडल जीतने के बाद लिंग परीक्षण में फेल – एक नौकरी तक नहीं.
निशा रानी दत्त – घर चलाने के बोझ की वजह से तीरंदाजी छोड़ी.

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नौरी मुंडू – कई राष्ट्रीय मैडल जीतने वाली आज घर चलाने के लिए बच्चों को पढ़ा रही है.

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रश्मिता पात्रा – फुटबॉल अंडर-16 में मैडल जीतने वाली गरीबी की वजह से छोटी सी सुपारी की दूकान चला रही है.
माखन सिंह – मिल्खा सिंह को हारने वाले माखन सिंह पैर टूटने के बाद गरीबी में मर गए.
खासबा दादासाहेब जाधव – 1952 के ओलम्पिक में कोई खर्च नहीं मिला. अपना घर-बार बेंच कर ओलम्पिक में गए और कांस्य जीता.
सरवन सिंह – 1954 के एसियान गेम्स में स्वर्ण जीतने वाले, टैक्सी चलाते रहे और अपना स्वर्ण पदक पैसों की कमी की वजह से बेंच.
मुरलीकांत पेटकर – पैरालिम्पिक्स 1972 में स्वर्ण जीता. लेकिन भारत में 1984 के बाद से रिकार्ड करना शुरू किया गया था इसलिए पेटकर का पदक सरकार के रिकार्ड में नहीं है.
देवेंद्र झाझरिया (विकलांग-एक हाथ नहीं) – पेटकर के बाद दूसरा भारतीय जिसने पैरालिम्पिक्स 2004 में स्वर्ण जीता, पद्म श्री से सम्मानित, लेकिन शायद ही कोई इन्हें जानता हो.

फोटो साभार: http://www.news18.com
शंकर लक्ष्मण – 2 ओलम्पिक स्वर्ण विजेता भुखमरी में मर गए.
बुधिया सिंह – उम्र 4 साल में 65 किलोमीटर की दूरी 7 घंटे में नापने वाले बुधिया सिंह दौड़ छोड़कर आज पढ़ाई कर रहे हैं.

फोटो साभार: http://www.newsnation.in
ये लिस्ट बहुत लंबी है. लेकिन इसमें दोष किसका.
इस देश में खिलाड़ी अपने दम पर तैयार होते है. फटे जूते, टूटा धनुष लेकर तैयारी करते खिलाड़ियों को भी रोना आता होगा.
बस इस देश के लोगों को मैडल चाहिए, अगर न भी मिले तो कोई बात नहीं.
सड़क के किनारे खेल दिखाने वाले, ट्रेन में जिम्नास्ट की कलाकारी करते छोटे छोटे बच्चे, सोचने पर मजबूर कर देते हैं, क्या 130 करोड़ के भारत में प्रतिभाओं की कमी है…

आपने आज तक बहुत सारी खूबसूरत इमारतें देखी होंगी, शिल्पकला से परिपूर्ण मंदिर, गुप्त काल की गुफाओं में की गयी नक्काशी या फिर सुन्दर चित्रकारी, लेकिन आपने शायद ही ऐसी कारीगरी देखी होगी. यहां की कारीगरी देखकर आप भी इसके मुरीद हो जाएंगे.

दुनिया की बहुत सारी इमारतें बेहतरीन कारीगरी, चित्रकारी और वास्तुशिल्प के लिए के लिए मशहूर हैं. इनमे से ऐसी ही एक इमारत ‘नासिर अल-मुल्क’ मस्जिद है जो बाहर से एक साधारण मस्जिद की तरह ही दिखाई देती है, लेकिन जब उगते सूरज की किरणें इस मस्जिद पर पड़ती हैं तो इसकी खूबसूरती में चार चाँद लग जाते हैं . इसकी खूबसूरती को देखने के लिए दुनिया भर के पर्यटक खिंचे चले आते हैं.

इसकी खूबसूरती के नज़ारे को शब्दों में बयां करना मुमकिन ही नहीं है, मस्जिद की भव्यता और खूबसूरती को केवल देख कर ही महसूस किया जा सकता है। यहां पर आकर आपको ऐसा लगेगा जैसे आप किसी और दुनिया (स्वर्ग) में ही आ गए हों.

इस मस्जिद के सामने वाले हिस्से में रंगीन काचों की जड़ाई का काम हुआ है, इसलिए जब उगते हुए सूर्य की किरणें इन काचो से छनकर अंदर मस्जिद के फर्श पर बिछे पर्शियन कालीन पर पड़ती है तो मस्जिद के अंदर रंगों का सागर उमड़ आता है. लेकिन यह नजारा केवल सुबह के समय ही रहता है जब रौशनी मस्जिद के सामने से आती है.

इस मस्जिद को ‘गुलाबी मस्जिद’ भी कहा जाता है क्योंकि इस मस्जिद की दीवारों, गुम्बदों, और छतों पर रंगीन चित्रकारी में गुलाबी रंग का कुछ ज्यादा ही उपयोग किया गया है, और यही गुलाबी रंग इसकी खूबसूरती को और बढ़ा देता है.

नासिर अल मुल्क मस्जिद ईरान के शिराज प्रांत में है। इस मस्जिद का निर्माण ईरान के शासक ‘मिर्जा हसन अली नासिर अल मुल्क’ ने किया था। मिर्जा यहां के कजर वंश के राजा थे। यह मस्जिद सन् 1876 से 1888 के बीच में बनी थी। मस्जिद का डिज़ाइन मोहम्मद हसन-ए-मिमार और मोहम्मद रज़ा काशी ने बनाया था।

गूगल मैप में देखें:
फोटो साभार: http://www.amazingplaces.com/news/when-sunlight-hits-this-mosque-it-is-just-breathtaking.html, www.thegoldenscope.com

सीधे शब्दों में , क्या वो दूकान घाटे में जा सकती है जिस पर ग्राहकों की भारी भीड़ लगी है. लोग सामान ख़रीदने के लिए लाइन में लगे हैं. जिन्हें सामान नहीं मिल रहा है वो अगले दिन आ रहे हैं लेकिन सामान उपलब्ध नहीं है.
लोग दीवाली का सामान लेने के होली से लाइन में लगे हैं. मुझे लगता है कि दुकानदार तो भारी मुनाफे में होना चाहिए, जिसकी दूकान इतनी चल रही है वो घाटे में हो भी कैसे हो सकता है. मेरा दैनिक अनुभव तो यही कहता है.
उस पर अगर सामान वापस करना है 70% कटौती के बाद अगर 30% ग्राहक को वापस मिले तो फिर तो दुकानदार कि तो बल्ले बल्ले ही हो जायेगी. सामान भी नहीं बिका और 70% कीमत का फायदा. फिर वही सामान दूसरे ग्राहक को तो बेचना ही है क्यूंकि इतनी लम्बी लाइन जो लगी है.

ऐसा अगर वास्तव में देखना हो तो रेलवे से अच्छा उदाहरण नहीं हो सकता है. सभी गाड़ियों में वेटिंग कि लम्बी कतार, अगर टिकट कन्फर्म हो गया है और इसके बाद अगर वापस किया तो 70% कटौती के बाद 30% वापसी, तत्काल में भी वेटिंग, और तत्काल रिजर्वेशन में तो टिकट कैंसिल कराने पर कोई वापसी भी नहीं है.
रेलवे कि वेबसाइट से अगर टिकट करा रहे हैं तो सर्विस चार्ज, + बैंक का भी सर्विस चार्ज, दोनों की बल्ले बल्ले. रेलवे की वेबसाइट पर दुनिया भर का विज्ञापन, हवाई जहाज से लेकर होटल तक की बुकिंग उपलब्ध है. फिर भी रेलवे घाटे में.
जनरल डिब्बों की बात करें तो उनमे सीटों की संख्या से 10 गुने लोग भूसे की तरह भरकर यात्रा करते हैं. फिर भी रेलवे घाटे में.
समझ नहीं आता पैसा जा कहाँ रहा है.
रेलवे रेल नीर बेचती है, लेकिन स्टेशनों पे विदेशी कंपनियों का ही पानी बिकता दिखेगा. एक लीटर पानी 20 रुपये में, चाहे वो रेल नीर हो, किनले, बिसलरी या फिर एक्वाफिना. रेल नीर भी उतना ही मार्जिन कमाता है जितना दूसरी विदेशी कम्पनियाँ. पूरे स्टेशन पर पानी ठंडा करने वाली एकाध मशीन होती है वो भी ठंडी पड़ी होती है. मजबूरन यात्रियों को पानी की बोतल खरीदनी पड़ती है. हो सकता है बड़ी रिश्वत का खेल हो. एक ठीक ठाक स्टेशन पर एक दिन में हजार दो हजार पानी की बोतलें बिकना तो आम बात है. रिश्वत खिलाओ, ठंडा पानी होगा नहीं तो बोतलें ही बिकेगी.
अब रेलवे के बारे में इतना लिखा है तो बुलेट ट्रेन की बात ना करूँ ये कैसे हो सकता है.
बुलेट ट्रेन जब भी चलेगी तो वो हमारे देश की शान होगी. सिर्फ मैं ही नहीं बल्कि सारा देश चाहता है की भारत हर क्षेत्र में आगे बढे और विकसित देशों को टक्कर दे. लेकिन उससे पहले हमें सिर्फ अमीरों और बिजनेसमैनों के बारे में सोचना बंद करके हर आम आदमी, किसान छोटी नौकरी करने वाले और दलितों, मजदूरों के बारे में भी सोचना शुरू करना पड़ेगा.
अब मुद्दा ये है की जब बुलेट ट्रेन चलेगी तो किसे फायदा होगा? जाहिर सी बात है, बिजनेसमैन, नेताओं और, और किसी को नहीं.और सब तो 2-4 घंटे से लेकर 10-12 घंटे देरी से चलने वाली ट्रेनों में ही यात्रा करेंगे.
अरे भाई, पहले इन ट्रेनों की दशा सुधार दो फिर बुलेट ट्रेन चला लेना. हम तो AC का भी ख्वाब नहीं देखते, शताब्दी, राजधानी तो दूर की बात है. उस पर बुलेट ट्रेन, बस जले पे नमक छिड़क लो. इस देश की 90% से ज्यादा आबादी जनरल डिब्बों और पैसेंजर ट्रेन में यात्रा करती है उनके लिए कोई सुविधाओं में सुधार नहीं, बस देश की 1-2% आबादी के सुविधाएं ही सुविधाएं.
चलिए वो सब छोडिए, ये सोचिये की गड़बड़ कहाँ है…
Image Source: www.thehindu.com, https://vak1969.com

चलो चले कुछ राजनीति कर आएं,
2017 आ गया है, चलो अपनी सरकार बनाये,
न हिन्दू लड़ें, न मुस्लिम लड़ें, चलो इन हिन्दू मुस्लिमों को लड़ायें,
आओ चलो, अपनी सरकार बनाये,
जहां दंगे न हों, चलो वहाँ दंगे कराये,
जनता न मरे तो मरवाएं,
हिन्दू मुस्लिम को भरमाये,
चलो 2017 आ गया है, राजनीति की रोटियां सिकवाएं,
आओ अपनी सरकार बनाएं.
क्या है कैराना का सच: पढ़ने के लिए क्लिक करें : http://navbharattimes.indiatimes.com/metro/lucknow/politics/truth-of-kairana-by-three-ground-reports/articleshow/52740142.cms

ये तो मैं भी कहता हूँ आरक्षण हटाओ, लेकिन जिन्हे आज़ादी के पहले से लेकर और बाद तक मंदिरों में जाने, कुए से पानी भरने तक से रोक गया, उन्हें भी मुख्य धारा में आने का अधिकार है.
दलितों और पिछड़ों को मुख्य धारा में लाने के लिया हमारे संविधान में आरक्षण का विधान किया गया है जिसका फायदा उन्हें मिला भी. लेकिन अब स्थित ये है की जो दलित और पिछड़े मुख्य धारा में आ गए हैं वही सबसे ज्यादा आरक्षण का फायदा उठते हैं. और जिन्हें अभी तक आरक्षण का फायदा नहीं मिला वो अब भी गरीबी में जी रहे हैं.
लेकिन जो अभी तक गरीब हैं उन्हें आरक्षण जरूर मिलना चाहिए. लेकिन वो ऐसे गरीब नहीं होने चाहिए जिनकी सालाना आय ६ लाख रुपये हो.
एक तरफ २०-२५ रुपये रोजाना कमाने वाला गरीबी रेखा पार कर अमीरी की श्रेणी में आ जाता है और दूसरी तरफ गुजरात में ५० हजार रुपये तक महीना कमाने वाले गरीब बनकर आरक्षण पाते हैं.
अब बात करते हैं टीना डॉबी और अंकित की जिनका मेसेज सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है की अंकित के ज्यादा नंबर होते हुए भी वो फेल हो गया और टीना के काम नंबर होते हुए भी वो आरक्षण के सहारे पास हो गयी.
आपको बता दें कि टीना डॉबी पहली दलित हैं जो 22 साल की उम्र में सिविल सेवा में टॉपर बनी हैं.

हाँ ये सत्य है की प्री एग्जाम में टीना ने आरक्षण का सहारा लिया, और ये उसका हक़ है जो संविधान ने उसे दिया है. लेकिन सिविल सेवा के मेन (मुख्य) पेपर में टीना ने कोई आरक्षण नहीं लिया और जनरल कैटेगरी में परीक्षा दी है. मुख्य परीक्षा में टीना को २०२५ में से १०६३ नंबर मिले हैं. जबकि दूसरे नंबर पर अतहर आमिर हैं जिन्हें १०१८ नंबर मिले हैं. तीसरे नंबर पर जसमीत सिंह हैं जिन्हें १०१४ नंबर मिले हैं. पहली और दूसरी रैंक में ४५ अंकों का फासला है जो की बहुत बड़ा है.
इसलिए ये कहना सरासर गलत है की टीना ने अयोग्य होते हुए भी सिविल सेवा में टॉप किया है.
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