आजकल पकौड़े की बड़ी धूम है. पकौड़ा बेचना कम से कम बेरोजगारी से तो अच्छा ही है. वैसे भी खाना खिलाना पुण्य का काम है. कमाई में भी ठीक ठाक है. पढ़ लिखकर बेरोजगारी से बिना पढ़े कम इन्वेस्टमेंट में अच्छी कमाई कर सकते हैं.
मोदीजी के इस बयान के बहुत बड़े मायने हैं. एक तो बेरोजगारी की समस्या से मुक्ति, लोगों की भूख मिटेगी, लोग दूसरों की नौकरी करने के बजाय अपना रोजगार खड़ा कर सकेंगे.
मोदीजी चाय बेचकर प्रधानमंत्री बन सकते हैं तो हो सकता है कोई पकोड़ा बेचने वाला सांसद विधायक बन जाए. इसलिए चाय नहीं तो पकोड़ा तो बेच ही सकते हैं.
दुनिया ऐसे उदाहरणों से भरी पड़ी है जिसमे चाय पकोड़े, पूड़ी सब्जी, नमकीन और मिठाइयां बेचने वाले लोगों का सैकड़ों करोड़ का बिजनेस है.
MDH वाले दद्दा को कौन नहीं जानता, इनकी शुरुआत ऐसे ही छोटी सी दूकान से हुई. निरमा पाउडर वाले करसन भाई कभी साइकिल पर अपना पाउडर बेचते थे. हल्दीराम की कभी छोटी सी मिठाई और नमकीन की दूकान थी.
लेकिन लेकिन लेकिन….
जब मैं अपने गाँव और कसबे के चाट- पकौड़े वालों, समोसे वालों और चाय बेचने वालों को देखता हूँ तो लगता है पूरे जीवन में उन्होंने कभी नए कपडे नहीं पहने होंगे. और ये सच भी है, पकौड़े बेचकर जैसे तैसे घर का खर्चा चलता है, बच्चे सरकारी प्राइमरी स्कूलों में पढ़ते हैं जहां ने फीस का झंझट और न ही किताबों का (सब कुछ सरकार देती है), साथ ही पढाई का भी ज्यादा झंझट नहीं क्यूंकि सुबह सुबह बच्चे और घर की औरतें पकौड़े बनाने का सामान तैयार करते हैं.
फिर इसके बाद भी पुलिस वाले, कमेटी, नगर पालिका वाले और लोकल के गुंडे मवाली या तो फ्री में खा जाते हैं या फिर जो कुछ कमाया उसमे से अपना हिस्सा मांगने आ पहुँचते हैं.
खैर जो भी हो हमारे नेता ने कहा है तो अच्छे के लिए ही कहा होगा.
लगे हाथ व्हाट्सएप्प पर वायरल ये कविता भी पढ़ लीजिये:
एक महान योद्धा और पारंगत धर्नुधर होने के बावजूद, भीलपुत्र एकलव्य महाभारत का एक भूला-बिसरा अध्याय बनकर रह गया। महाभारत की गाथा बेहद व्यापक है। अनेक घटनाएं और पात्रों की वजह से बहुत से ऐसे चरित्र भी हैं, इतिहास ने जिन्हें नजरअंदाज कर दिया है। इन्हीं चरित्रों में से एक है एकलव्य। एकलव्य की कहानी बेहद मार्मिक है, महाभारत की कहानी में जिन्हें सदाचारी और हमेशा धर्म की राह पर चलने वाला दिखाया गया है, दरअसल एकलव्य के जीवन में वही लोग सबसे अधिक क्रूर साबित हुए।
who-killed-eklavya-and-why
महाभारत के नायक
द्रोणाचार्य के महान शिष्य महाभारत की कहानी के नायक रहे अर्जुन को सबसे बेहतरीन और अचूक धनुर्धर माना जाता है। लेकिन एकलव्य के सामने अर्जुन के तीर भी अपना निशाना नहीं पहचान पाते थे। एकलव्य की यही काबीलियत उसके लिए सबसे बड़ी दुश्मन साबित हुई।
जीवनगाथा
एकलव्य की जीवन गाथा पर गौर करें तो वह बेहद मार्मिक है। वह एक भीलपुत्र था और जंगल में अपने पिता के साथ रहता था। उसके पिता हिरण्यधनु उसे यही सीख देते थे कि उसे अपने जीवन में आगे बढ़ना चाहिए।
शिकारी का बेटा
शिकारी का बेटा होने की वजह से एकलव्य को धनुष-बाण से बहुत प्रेम था। बचपन से ही वह एक बेहतरीन धनुर्धर बनने का ख्वाब देखता था। एक दिन बालक एकलव्य बांस के बने धनुष पर बांस का ही तीर चढ़ाकर निशाना लगा रहा था कि पुलक मुनि की नजर उस पर पड़ी।
पुलक मुनि का आगमन
पुलक मुनि एकलव्य का आत्मविश्वास देखकर भौचक्के रह गए और एकलव्य से कहा कि वह उन्हें अपने पिता के पास ले चले। मुनि की बात मानकर एकलव्य उन्हें अपने पिता के पास ले आया। पुलक मुनि ने हिरण्यधनु से कहा कि उनका पुत्र बेहतरीन धनुर्धर बनने के काबिल है, इसे सही दीक्षा दिलवाने का प्रयास करना चाहिए।
महान धनुर्धर
पुलक मुनि की बात से प्रभावित होकर भील राजा हिरण्यधनु, अपने पुत्र एकलव्य को द्रोण जैसे महान गुरु के पास ले गया। हिरण्यधनु ने जब द्रोण को अपना परिचय दिया कि वह एक भील है और अपने पुत्र को धनुर्धर बनाना चाहता है तो उसकी बात सुनकर द्रोणाचार्य बहुत हंसे।
अपमान
द्रोण ने हिरण्यधनु से कहा कि उनका काम केवल शिकार के लायक धनुष विद्या सीखना है, युद्ध में शत्रुओं को मारना उनका काम नहीं। वैसे भी द्रोण, भीष्म पितामह को दिए गए अपने वचन के लिए प्रतिबद्ध थे कि वह केवल कौरव वंश के राजकुमारों को ही अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देंगे।
सेवक के तौर पर रहना
द्रोण की ओर से अपमानित होकर हिरण्यधनु तो वापिस जंगल लौट आए लेकिन एकलव्य को द्रोण के सेवक के तौर पर उन्हीं के पास छोड़ आए। द्रोण की ओर से दीक्षा देने की बात नकार देने के बावजूद एकलव्य ने हिम्मत नहीं हारी, वह सेवकों की भांति उनके साथ रहने लगा।
सेवक बना एकलव्य
द्रोणाचार्य ने एकलव्या को रहने के लिए एक झोपड़ी दिलवा दी। एकलव्य का काम बस इतना होता था कि जब सभी राजकुमार बाण विद्या का अभ्यास कर चले जाएं तब वह सभी बाणों को उठाकर वापस तर्कश में डालकर रख दे।
कबीले का राजकुमार
जब द्रोणाचार्य अपने शिष्यों को अस्त्र चलाना सिखाते थे तब एकलव्य भी वहीं छिपकर द्रोण की हर बात, हर सीख को सुनता था। अपने कबीले का राजकुमार होने के बावजूद एकलव्य द्रोण के पास एक सेवक बनकर रह रहा था।
एकलव्य को मिला अवसर
एक दिन अभ्यास जल्दी समाप्त हो जाने के कारण सभी राजकुमार समय से पहले ही लौट गए। ऐसे में एकलव्य को धनुष चलाने का एक अदद मौका मिल गया। लेकिन अफसोस उनके अचूक निशाने को दुर्योधन ने देख लिया और द्रोणाचार्य को इस बात की जानकारी दी।
हताश हुआ एकलव्य
द्रोणाचार्य ने एकलव्य को वहां से चले जाने को कहा। हताश-निराश एकलव्य घर की ओर रुख कर गया, लेकिन रास्ते में उसने सोचा कि वह घर जाकर क्या करेगा, इसलिए बीच में ही एक आदिवासी बस्ती में ठहर गया। उसने आदिवासी सरदार को अपना परिचय दिया और कहा कि वह यहां रहकर धनुष विद्या का अभ्यास करना चाहता है। सरदार ने प्रसन्नतापूर्वक एकलव्य को अनुमति दे दी।
मिट्टी की प्रतिमा
एकलव्य ने जंगल में रहते हुए गुरु द्रोण की एक मिट्टी की प्रतिमा बनाई और उसी के सामने धनुष-बाण का अभ्यास करने लगा।
अर्जुन को वचन
समय बीतता गया और कौरव वंश के अन्य बालकों, कौरव और पांडवों के साथ-साथ एकलव्य भी युवा हो गया। द्रोणाचार्य ने बचपन में ही अर्जुन को यह वचन दिया था कि उससे बेहतर धनुर्धर इस ब्रह्मांड में दूसरा नहीं होगा। लेकिन एक दिन द्रोण और अर्जुन, दोनों की ही यह गलतफहमी दूर हो गई, जब उन्होंने एकलव्य को धनुष चलाते हुए देखा।
एकाग्रता हुई भंग
एक दिन की बात है, एकलव्य अभ्यास कर रहा था और एक कुत्ता, बार-बार भोंककर उसकी एकाग्रता को भंग करता जा रहा था। एकलव्य ने अपने तीरों से कुत्ते का मुंह कुछ ऐसे बंद किया कि रक्त की बूंद भी उसके शरीर से नहीं बही।
राजकुमारों का कुत्ता
यह कुत्ता कोई साधारण कुत्ता नहीं बल्कि पांडवों और कौरवों के साथ द्रोण के आश्रम में रहने वाला कुत्ता था। जब वह कुत्ता वापस आश्रम गया तो द्रोण यह देखकर हैरान रह गए कि कितनी सफाई से उस कुत्ते के मुंह को तीरों से बंद किया गया है।
सैनिकों के साथ पहुंचे द्रोण
कुछ ही देर बीती होगी कि द्रोणाचार्य, अर्जुन, युधिष्ठिर और दुर्योधन समेत, कई सैनिक भी एकलव्य के पास आ पहुंचे। एकलव्य ने जैसे ही द्रोणाचार्य को अपने समक्ष देखा, उन्हें प्रणाम करने के लिए पहुंच गया।
कुत्ते को कष्ट
गुरु द्रोण ने क्रोधित होकर पूछा कि किसने राजकुमार के कुत्ते को इतना कष्ट पहुंचाया है? इस सवाल के जवाब में एकलव्य ने कहा कि इस कुत्ते को जरा भी कष्ट नहीं हुआ क्योंकि इसका मुंह मैंने आपके द्वारा सिखाए गए तरीके से बंद किया है।
बेहतर धनुर्धर
गुरु द्रोण पहले तो आश्चर्यचकित हुए लेकिन बाद में अपनी मिट्टी की मूर्ति देखकर एकलव्य को पहचान गए। अर्जुन, अपने गुरु द्रोण को ऐसे देखने लगा जैसे उन पर हंस रहा हो, क्योंकि उससे बेहतर धनुर्धर आज उसके सामने खड़ा था।
एकलव्य की प्रतिभा
एकलव्य की प्रतिभा को देखकर द्रोणाचार्य संकट में पड़ गए। लेकिन अचानक उन्हें एक युक्ति सूझी। उन्होंने एकलव्य से गुरुदक्षिणा में उसके दाएं हाथ का अंगूठा ही मांग लिया ताकि एकलव्य कभी धनुष चला ना पाए।
आज्ञाकारी शिष्य
एक आदर्श और आज्ञाकारी शिष्य की तरह एकलव्य ने अपनी आंखों में आंसू भरकर, बिना सोचे-समझे अपने गुरु को अपना अंगूठा दे दिया।
विष्णु पुराण
विष्णु पुराण और हरिवंशपुराण में उल्लिखित है कि निषाद वंश का राजा बनने के बाद एकलव्य ने जरासंध की सेना की तरफ से मथुरा पर आक्रमण कर यादव सेना का लगभग सफाया कर दिया था। यादव वंश में हाहाकर मचने के बाद जब कृष्ण ने दाहिने हाथ में महज चार अंगुलियों के सहारे धनुष बाण चलाते हुए एकलव्य को देखा तो उन्हें इस दृश्य पर विश्वास ही नहीं हुआ।
वीरगति को प्राप्त हुआ एकलव्य
एकलव्य अकेले ही सैकड़ों यादव वंशी योद्धाओं को रोकने में सक्षम था। इसी युद्ध में एकलव्य, कृष्ण के हाथों वीरगति को प्राप्त हुआ था। उसका पुत्र केतुमान भीम के हाथ से मारा गया था।
कृष्ण का अर्जुन प्रेम
जब युद्ध के बाद सभी पांडव अपनी वीरता का बखान कर रहे थे तब कृष्ण ने अपने अर्जुन प्रेम की बात कबूली थी।
कृष्ण का कथन
कृष्ण ने अर्जुन से स्पष्ट कहा था कि “तुम्हारे प्रेम में मैंने क्या-क्या नहीं किया है। तुम संसार के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कहलाओ इसके लिए मैंने द्रोणाचार्य का वध करवाया, महापराक्रमी कर्ण को कमजोर किया और न चाहते हुए भी तुम्हारी जानकारी के बिना भील पुत्र एकलव्य को भी वीरगति दी ताकि तुम्हारे रास्ते में कोई बाधा ना आए”।
कौन नहीं जानता सलमान खान को. बॉलीवुड का यह भाई का 27 दिसम्बर 2017 को 52 वर्ष का हो गया. आज फिल्मे सलमान के नाम से चलती हैं. बड़े बड़े डायरेक्टर सलमान के दरवाजे पर अपनी फिल्मो में लेने के लिए खड़े हैं लेकिन सलमान को जो अच्छी लगे वो वही फिल्म करते हैं.
सलमान की नयी फिल्म “टाइगर जिन्दा है” बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाये हुए है। लेकिन, क्या आप यकीन करेंगे कि सलमान की कुछ ऐसी भी फ़िल्में रही हैं जो कभी सिनेमा हॉल तक पहुंची ही नहीं। यानी रिलीज़ ही नहीं हो पायी। आइये जानते हैं उनकी कुछ ऐसी ही फ़िल्मों के बारे में।
‘ऐ मेरे दोस्त’
सलमान ख़ान अपने भाई अरबाज़ ख़ान के साथ पहली बार 1998 में आई फ़िल्म ‘प्यार किया तो डरना क्या’ में दिखे थे। लेकिन, इन दोनों भाइयों की जोड़ी इस फ़िल्म से पहले ‘ऐ मेरे दोस्त’ नाम की एक फ़िल्म में आने वाली थी। फ़िल्म में सलमान-अरबाज़ के अलावा करिश्मा कपूर और दिव्या भारती लीड रोल में थे। इस फ़िल्म के एक गाने की भी रिकार्डिंग हो गयी थी। इससे पहले की काम आगे बढ़ता एक हादसे में दिव्या भारती की मौत हो गयी। फ़िल्म का काम वहीं रुक गया। बहरहाल, ‘ऐ मेरे दोस्त’ के लिए जिस गाने की रिकार्डिंग हुई थी वो सलमान की फ़िल्म ‘मंझधार’ का हिस्सा बनी।
‘’बुलंद’
सलमान ख़ान की एक और फ़िल्म जो डिब्बा बंद हो गयी उसका नाम है- ‘बुलंद’। इस फ़िल्म में सलमान के साथ सोमी अली लीड रोल निभा रही थीं। उस दौर में सलमान-सोमी अली के अफ़ेयर के ख़ूब चर्चे हुआ करते थे। निर्माता उनके बीच के रिलेशनशिप से जुड़ी ख़बरों को भुनाना चाहते थे। लेकिन, कहते हैं किसी अज्ञात कारणों से इस फ़िल्म का काम रोक दिया गया। यह फ़िल्म आधी से ज्यादा शूट कर ली गयी थी। फ़िल्म में काफी पैसा भी लगाया जा चुका था। लेकिन, अंततः फ़िल्म नहीं पूरी हो पायी।
‘राम’
सलमान के छोटे भाई सोहेल ख़ान ने सलमान ख़ान के साथ एक डायरेक्टर के रूप में ‘प्यार किया तो डरना क्या’ और ‘हेल्लो ब्रदर’ जैसी कामयाब फ़िल्में दी हैं। लेकिन, कम लोग ही जानते हैं कि सोहेल अपने भाई सलमान ख़ान के साथ एक और फ़िल्म करने वाले थे- ‘राम’। इस फ़िल्म के लिए अनिल कपूर और पूजा भट्ट को भी साइन कर लिया गया था। कुछ क्रिएटिव कारणों से पहले तो इस फ़िल्म को टाला गया। लेकिन, बाद में इस फ़िल्म को बनाने का आईडिया ही ड्राप करना पड़ा! जबकि फ़िल्म का काम शुरू हो चुका था।
‘चोरी मेरा नाम’
‘चोरी मेरा नाम’ इस अजीबोगरीब नाम से भी सलमान की एक फ़िल्म बन रही थी। जिसमें सुनील शेट्टी, शिल्पा शेट्टी, काजोल जैसे बड़े नाम थे। यह फ़िल्म भी किसी कारण से नहीं बन पायी। फ़िल्म के लिए सलमान और सुनील शेट्टी के बीच फ़िल्माया गया एक स्टंट सीन बाद में एक कोल्ड ड्रिंक कम्पनी के विज्ञापन का हिस्सा बन गया।
‘दस’
सलमान ख़ान और संजय दत्त की फ़िल्म ‘दस’ भी सलमान के करियर की एक ऐसी फ़िल्म है जो कभी बन नहीं पायी। इस फ़िल्म का एक गीत ‘सुनो गौर से दुनिया वालों..’ आप सबने ज़रूर सुना होगा। डायरेक्टर मुकुल एस आनंद की अचानक हुई निधन से यह फ़िल्म पूरी नहीं हो सकी। हालांकि, फ़िल्म का म्युज़िक एल्बम 1999 में रिलीज़ किया गया था।
‘राजू, राजा, राम’
डेविड धवन ने सलमान ख़ान के साथ जुड़वा जैसी ब्लॉकबस्टर फ़िल्म दी है। जबकि डेविड के फेवरेट एक्टर रहे हैं गोविंदा। डेविड धवन गोविंदा, सलमान और जैकी श्रॉफ के साथ ‘राजू, राजा, राम’ बनाने की योजना पर काम कर रहे थे। लेकिन, इस हैवी स्टारकास्ट के साथ उस समय उन्हें इस फ़िल्म के लिए कोई फायनेंसर ही नहीं मिला और डेविड को अपनी प्लानिंग रोक देनी पड़ी। इसके बाद ही उन्होंने सलमान के साथ ‘जुड़वा’ बनायी।
‘आंख मिचोली’
‘जुड़वा’ में सलमान का डबल रोल था और यह फ़िल्म खूब चली थी। जुड़वा की कामयाबी के बाद अनीज बज़्मी सलमान के साथ ‘आंख मिचोली’ बनाना चाहते थे। लेकिन, सलमान उनदिनों काफी व्यस्त थे और जुड़वा के बाद वो दुबारा फिलहाल डबल रोल करने के मूड में नहीं थे। इसलिए इस फ़िल्म की प्लानिंग भी धरी ही रह गयी। बाद में, अनीज बज़्मी ने सलमान के साथ ‘नो इंट्री’ (2005) फ़िल्म बनायी।
‘जलवा’
डायरेक्टर केतन धवन ने फ़िल्म जलवा के लिए सलमान ख़ान के अलावा संजय दत्त और अरमान कोहली को साइन कर लिया था। इससे पहले की वो इस फ़िल्म को आगे बढ़ाते और वो थोड़े कंफ्यूज हो गए। उन्होंने इस फ़िल्म का आईडिया ड्राप कर दिया और इस फ़िल्म को छोड़ नए स्टारकास्ट के साथ एक फ़ैमिली फ़िल्म बनाने में जुट गए। गौरतलब है कि डेविड धवन ने सलमान के साथ ‘ये है जलवा’ नाम से साल 2002 में एक फ़िल्म बनायी। जिसमें, अमीषा पटेल, ऋषि कपूर, अनुपम खेर आदि एक्टर्स थे।
‘सागर से गहरा प्यार’
रवीना टंडन के साथ सलमान की एक फ़िल्म ‘सागर से गहरा प्यार’ भी कभी पाईपलाइन में थी। लेकिन, इस फ़िल्म की सिर्फ घोषणा ही हो सकी, कभी बन नहीं पायी।
‘हैंडसम’
‘सागर से गहरा प्यार’ की तरह ही सलमान की एक और फ़िल्म ‘हैंडसम’ भी एनाउंसमेंट के बाद डिब्बाबंद हो गयी। इस फ़िल्म में सलमान के साथ संगीता बिजलानी और नगमा को लिया गया था।
हाल के दिनों की बात करें तो अनीज बज्मी ‘नो इंट्री’ का सिक्वल ‘नो इंट्री में इंट्री’ बनाना चाहते थे। लेकिन, किन्हीं कारणों से उनकी यह योजना नाकामयाब रही। साल 2005 आते-आते सलमान का स्टारडम आसमान तक पहुंच चुका था और उसके बाद ऐसी किसी फ़िल्म की योजना बनी ही नहीं जो किसी वजह से अधूरी रह गयी हो। ज़ाहिर है सलमान ने समय के साथ यह सीख लिया है कि अब कैसी फ़िल्में करनी हैं और किन लोगों को हां बोलना है!
क्या मीडिया/पत्रकारिता पर राजनीति या कॉर्पोरेट का कंट्रोल जायज है?
ध्यान रहे, मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है.
इससे पहले की इस प्रश्न पर विचार किया जाए की किसी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में मीडिया की भूमिका क्या है, यह स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है की लोकतंत्र का तात्पर्य क्या है. लोकतंत्र से अभिप्राय उस शासन व्यवस्था से है जो जनता के द्वारा, जनता के लिए बनाई गयी हो और जिसके शासक भी जनप्रतिनिधि ही हों.सुनने में तो यह परिभाषा अत्यंत ही सुन्दर लगती है.
“लोकतंत्र” दुनिया में मनुष्य के द्वारा बनाया गया सबसे खूबसूरत और हसीन शब्द है.
विडम्बना यह है की लोकतंत्र के शाब्दिक अर्थ को तो हम जानते हैं लेकिन व्यावहारिक तौर पर उसका विकास हम नहीं कर पाए हैं. किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए विश्वसनीय सूचना माध्यम की आवश्यकता होती है. इसी सूचना माध्यम से सरकार की नीतियों, विभिन्न योजनाओं से अवगत हुआ जा सकता है. ऐसे में मीडिया ही वह सूचना माध्यम है जिससे विश्वसनीय सूचनाएं पायी जा सकती हैं. यह सच है की किसी भी अखबार या मीडिया हाउस को चलाने के लिए धन की आवश्यकता होती है लेकिन केवल धन कमाने के लिए अखबार या मीडिया हाउस चलाना ठीक नहीं. नवउदारवादी शक्तियों ने सबसे पहले अपने शिकंजे में इन्हीं मीडिया घरानों को लिया क्यूंकि मीडिया की दखल घर- घर में है और अपना तंत्र फैलाने के लिए मीडिया से ज्यादा और विश्वसनीय माध्यम और क्या हो सकता है. यही वजह है की लगभग हर बड़े कारपोरेट के पास एक खबरिया चैनल है जिन्होंने देश के शीर्षस्थ पत्रकारों को मोटी तनख्वाह देकर खरीद लिया है और इन पत्रकारों की की यह मजबूरी है की अपने मालिकों का यशोगान करें. मीडिया आज अंधविश्वास का पोषक बन गया है. कहाँ तो पत्रकारिता का उत्तरदायित्व समाज में अलख जगाना हुआ करता था, ज्ञान का दीपक जलाना हुआ करता था लेकिन आज हालत यह है की ये समाचार चॅनेल एवं अखबार अंधविश्वासों को फैला रहे हैं.
जिस प्रकार स्टिंग ऑपरेशन चलाकर भ्रष्ट अधिकारियों को मीडिया ने बेनकाब किया है वह भी तारीफ के काबिल है. सांप्रदायिक दंगों के दौरान मीडिया द्वारा अपने दायित्व का निर्वहन बखूबी किया जा रहा है लेकिन होना यह भी चाहिए की सांप्रदायिक विचार फैलाने वाले चेहरों को भी बेनकाब किया जाए.
मीडिया को लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए पूरी तरह दोषी नहीं ठहराया जा सकता. अगर देश की गरीबी और भुखमरी की ओर मीडिया की नजर नहीं जाती तो इसका दोषी दर्शक वर्ग भी है जो इसे देखना पसंद नहीं करता. मीडिया ने अगर ‘जो दिखता है, वही बिकता है‘ या ‘ जो बिकता है, वही दिखता है‘ को अपना मूलमंत्र बनाया है तो कहीं न कहीं इसमें देखने वालों की रूचि भी शामिल है. अंततः यह नहीं भूलना चाहिए की लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाकर रखने की जिम्मेदारी केवल मीडिया की ही नहीं बल्कि उस समाज की भी है जो उस देश का नागरिक है.
इंटरनेट पर लाखों – करोड़ों वेबसाइट मौजूद हैं. हर वेबसाइट का कुछ न कुछ मकसद है. आपको भी जब कुछ ढूंढना होता है तो आप गूगल करते हैं. लेकिन हम आपके लिए लाये हैं कुछ बेहतरीन वेबसाइट जो आपके काफी काम की हो सकती हैं.
क्या आपने Catch 22 नियम के बारे में सुना है? अगर नहीं तो आइये जानते हैं Catch 22 नियम के बारे में.
एक ऐसी परिस्थिति जिसका कोई हल नहीं निकलता. इसके नियम इस तरह विरोधाभाषी होते हैं की उनका हल असंभव होता है.
इसे एक उदहारण से समझते हैं:
एक लड़के को ट्रैफिक पुलिस वाले ने पकड़ लिया और उससे उसका ड्राइविंग लाइसेंस दिखने को कहा.
लड़के ने कहा: नहीं है.
पुलिस: लइसेंस है नहीं या बनवाया ही नहीं?
लड़का: बनवाया ही नहीं.
पुलिस: क्यों?
लड़का: लइसेंस बनवाने तो गया था लेकिन वो वोटर आईडी मांग रहे थे जोकि मेरे पास नहीं थी.
पुलिस: तो वोटर आईडी बनवा लेनी चाहिए.
लड़का: वोटर आईडी बनवाने गया था, लेकिन वो राशन कार्ड मांग रहे थे, वो मेरे पास नहीं है.
पुलिस: तो राशन कार्ड बनवा लो.
लड़का: राशन कार्ड बनवाने गया था, वो बैंक की पासबुक मांग रहे थे, लेकिन वो भी मेरे पास नहीं है.
पुलिस: तो इसमें क्या समस्या है, बैंक में अकाउंट खुलवा लो.
लड़का: बैंक में गया था लेकिन वो ड्राइविंग लइसेंस मांग रहे थे.
इस उदहारण में कुछ भी गलत नहीं है और इसका कोई भी हल भी नहीं है और यही परिस्थिति Catch – 22 कहलाती है.
दरअसल Catch – 22 एक उपन्यास है जिसे एक अमेरिकी लेखक जोसफ हेलर ने लिखा था. उन्होंने यह उपन्यास 1953 में लिखना शुरू किया था और 1961 में यह पब्लिश हुआ था. यह उपन्यास बीसवीं सदी के अच्छे उपन्यासों में शामिल है.
आइये Catch – 22 के कुछ और उदाहरण देखें, ये वास्तविक भी हैं और इन उदाहरणों को पढ़कर आपको हंसी भी आएगी, लेकिन ये गंभीर भी हैं.
नौकरी के लिए अनुभव चाहिए
और
अनुभव के लिए नौकरी चाहिए.
है न अद्भुत. अब आप ही बताइये इस परिस्थिति का क्या हल है?
इस नियम का यही नियम है की अगर नियम मानते हो तो कोई हल नहीं है, और अगर हल निकालने की कोशिश करते हो तो नियम टूट जाता है.
बैंक उसको कभी लोन नहीं देती जिसे इसकी जरूरत है.
यह एक सजीव उदाहरण है, जब तक आपके पास पैसा है तब तक बैंक वाले लोन और क्रेडिट कार्ड लिए आपके पीछे घूमेंगे, और अगर आपके पास जॉब नहीं है और पैसे की जरूरत है तो न तो आपका लोन अप्रूव होगा और न ही क्रेडिट कार्ड अप्रूव होगा. और अगर पैसे की कमी से कभी लोन या क्रेडिट कार्ड का बिल नहीं भर पाए तो समझ लीजिये बैंक वाले आपसे लोन वसूलने के लिए पीछे ही पड़ जाएंगे.
अरे भाई अगर पैसे ही होते तो लोन या बिल सही समय पर नहीं चुका देते.
इस तीसरे उदहारण में भी कोई गलती नहीं है.
स्कूल में टीचर छात्र से:-
टीचर : होम वर्क क्यों नहीं किया ??
छात्र : सर बिजली नहीं थी।
टीचर : तो ममोमबत्ती जला लेते।
छात्र : सर माचिस नहीं थी।
टीचर : माचिस क्यों नहीं थी?
छात्र : पूजा घर में रखी थी।
टीचर : तो वहां से ले आते।
छात्र : नहाया हुआ नहीं था।
टीचर : नहाया क्यों नहीं था ?
छात्र : पानी नहीं था।
टीचर : पानी क्यों नहीं था ?
छात्र : मोटर नहीं चल रही थी।
टीचर : तो, मोटर क्यों नहीं चल रही थी ?
छात्र : सर यही तो पहले बताया था की लाइट नहीं थी।
अब आपको समझ आ गया होगा की ये सिर्फ जोक ही नहीं हैं बल्कि Catch 22 के नियम हैं जो असंभव कंडीशन को फॉलो करते हैं.
आजकल फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर फर्जी न्यूज का जोर पकड़ रहा है. फोटोशॉप का ज़माना है तो लोग अपनी कलाकारी दिखते हुए फोटोशॉप की हुई फोटो को व्हाट्सएप्प और फेसबुक पर शेयर कर देते हैं. देश की ज्यादातर जनता के हाथ में मोबाइल तो पहले पहुंच गया था लेकिन इंटरनेट चलाना अब सीखा है. लेकिन इंटरनेट के घातक परिणामों से अभी तक अनजान हैं.
जैसे एटीएम तो बैंकों ने लोगो को हाथ में पकड़ा दिया. लेकिन फर्जी RBI की एक काल पर ही अपने कार्ड के नंबर से लेकर पासवर्ड, CVV कोड और यहां तक की OTP तक बता देते हैं. और बाद में सर पकड़ कर रोते हैं.
वैसे ही इंटरनेट और सोशल मीडिया पर चलने वाली फर्जी न्यूज को देखकर सच्चाई भूल कर अपने ही इतिहास को गलत साबित करते फिरते हैं. साथ ही साथ ऐसे मेसेज को इतनी खूबसूरती के साथ लिखा जाता है की आम जनमानस को सहज ही विश्वास हो जाता है. साथ में उस मेसेज को वायरल करने के लिए कई ग्रुप में शेयर करने के लिए भी कहा जाता है.
आजकल एक कीड़े का मेसेज खूब वायरल हो रहा है. और साथ में दी गयी तस्वीर को देखकर तो लोग उसे बिलकुल ही असली समझ बैठते हैं. तो आइये उस कीड़े और उन फोटो की हकीकत को समझते हैं.
इस फोटो में बताया गया है की इस कीड़े को छूने से त्वचा में खतरनाक तरीके का इन्फेक्शन हो जाता है. दूसरी फोटो में उँगलियों में इन्फेक्शन दिखाया गया है.
लेकिन हकीकत में जिन लोगों ने इस कीड़े को देखा होगा वो इसके बारे में जानते होंगे. और जो इसके बारे में नहीं जानते हैं तो बता दे.
यह कीड़ा एक Giant Water Bug है जो मनुष्यों के लिए बिलकुल भी हानिकारक नहीं है. यह कीड़ा, अमेरिका, अफ्रीका और भारत में पाया जाता है. इसकी लम्बाई लगभग 1.5 इंच से 2 इंच तक होती है.
ये सब है फोटोशॉप का कमाल, आपने कमल का फल अगर देखा होगा तो समझ गए होंगे की एक फोटो को कमल के फल के साथ मिक्स किया गया है.
दूसरी फोटो में ऐसा लगता है की ऊँगली के पोर सड़ गए हैं और उनमे गड्ढे हो गए हैं, जबकि हकीकत ये है की इस फोटो को भी फोटोशॉप की मदद से बनाया गया है. दरअसल एक बिना जबड़े की मछली होती है जिसे Lamprey कहते हैं. इसका मुंह बिना जबड़े का होता है और इसके मुंह की फोटो को ऊँगली के पोर के साथ फोटोशॉप की सहायता से मिक्स करके यह नया रूप दिया गया है.
ऊपर दी फोटो सामान्यतः उन लोगों में डर पैदा करती हैं जिन्हे trypophobia ( छिद्रों का डर) नामक बीमारी होती है.
आइये अब देखते हैं की ऊपर दिया गया हाथ कैसे बनाया जाता है. फिल्मो में इस तरह के मेकअप आम बात है.
ऐ खुदा,
तुझसे नाराज हूँ,
क्यों?
शायद मुझे लगता है
कि
जिसे जरूरत है
उसे तूने कुछ दिया नहीं.
और
जिसके पास पहले से
इतना कुछ है
उसे तू छप्पर फाड़ के
दिए जा रहा है.
इसलिए,
ऐ खुदा,
तुझसे नाराज हूँ,
कोई प्यार को तरसे
किसी को प्यार से
फुरसत नहीं है.
किसी के हाथो में
देकर तूने छीन लिया है.
और
किसी कि झोली
भरे जा रहा है.
इसलिए,
ऐ खुदा,
तुझसे नाराज हूँ,
जो सच्चा है
उससे तू छीने जा रहा है
जो झूठा है
उसकी झोली
भरे जा रहा है.
कानून का जो
सम्मान करे,
और
कानून से जो डरे,
कानून उसके पीछे पड़े,
जो कानून को तोड़े,
और
अपने हाँथ में
लेकर खिलवाड़ करे,
कानून उससे डरे,
भागता – बचता फिरे.
इसलिए,
ऐ खुदा,
तुझसे नाराज हूँ,
आँखों में
सपने दिखाकर
दिल तोडना
तेरी फितरत हो गयी है.
और
जो दिल तोड़ते हैं
उनके
आँखों के सपने
तू पूरे किये जा रहा है.
इसलिए,
ऐ खुदा,
तुझसे नाराज हूँ,
साधू संत अब
माया के पीछे पड़े हैं,
माया तो छोड़ो,
चरित्र से भी गिरे हैं.
और कुछ तो
अपनी दुकानदारी में लगे हैं.
आत्मा – परमात्मा
की बात करने वाले,
बीसियों पहरेदारों
से घिरे हैं.
इसलिए,
ऐ खुदा,
तुझसे नाराज हूँ,
मंदिर – मस्जिद अब
कहने को तेरा घर हैं,
वैसे
ये अब कमाई
का धंधा बन गये हैं.
महंत बनने को
खून किये जा रहे हैं,
और मस्जिदों से
हथियारों के जखीरे
मिल रहे हैं.
इसलिए,
ऐ खुदा,
तुझसे नाराज हूँ,
और शायद
इसीलिए
मैं तुझपर
विश्वास खोता जा रहा हूँ
और
तेरा विश्वास
मुझ पर से
उठता जा रहा है.
इसलिए,
ऐ खुदा,
तुझसे नाराज हूँ,
और
शायद
तुझसे
बहुत नाराज हूँ.