यह कविता मुझे एक पुरानी किताब में मिली. अच्छी लगी तो पोस्ट कर दी. कृपया इस पर विचार जरूर करें.
सिर्फ दूसरों की मन की बाते मत सुनिए. आपके मन में जो हो वो कहिये. सवाल करिये. पूँछिये, ऐसा क्यों है.
जो हल चलाता है उसके हिस्से में सदा छप्पर ही क्यों आता है?
जो गोदामों में गेहूं, सरसों भरता है, उसके कोठी बंगले क्यों बन जाते हैं?

शहरों में खूब रौशनी है फिर गाँवों में अँधियारा क्यों है?
शहरों में चौड़ी सड़के हैं, गाँवों में संकरी गालियां क्यों हैं?
क्यों रामू, कमरू और हरिया शहर भागते हैं?

पानी कम क्यों हो रहा है? जंगल कौन काट रहा है?
कटे पेड़ कहाँ जा रहे हैं?
गाँव के बच्चों का दूध कहाँ जा रहा है?
आदमी – आदमी के बीच इतना फर्क क्यों है?

कुछ की तोंद इतनी फूली क्यों है?
हाड तोड़ मेहनत के बाद भी, बहुतों के पेट पिचके क्यों हैं?

जो पत्थर काटते हैं, रिक्शा खींचते हैं, लोहा कूटते हैं,
उन्हें साफ़ – सुथरे घरों में रहने का हक़ क्यों नहीं है?

इतनी बड़ी दुनिया में कितनी चीजें हैं, कितनी घटनाएं हैं?
सब कुछ जानने के लिए, सबके बारे में सवाल करो!!
साभार: अनजान




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