परदादा ब्रह्मा, पिता विश्रवा मुनि — फिर कैसे राक्षस बना रावण?

rawana

रामायण का सबसे रहस्यमय और चर्चित चरित्र — रावण, आज भी लोगों के मन में जिज्ञासा और चर्चा का विषय है।
एक ओर वह अत्यंत ज्ञानी, शास्त्रों का पंडित और भगवान शिव का भक्त था,
तो दूसरी ओर उसका नाम अहंकार, अधर्म और विनाश का प्रतीक बन गया।
आख़िर ऐसा क्या हुआ कि ब्रह्मा के वंशज और ऋषि पुत्र होते हुए भी रावण ‘राक्षस’ कहलाया?

रावण का जन्म और वंश परंपरा

रावण का जन्म ऋषि विश्रवा और कैकेसी के घर हुआ था।
विश्रवा, महर्षि पुलस्त्य के पुत्र थे — इसलिए रावण का वंश ब्राह्मण कुल का था।
वहीं कैकेसी राक्षस कुल के राजा सुमाली की पुत्री थीं।
इसलिए रावण के स्वभाव में दोनों संस्कार मिले —
पिता से ज्ञान और तपस्या की विरासत, और माता से राक्षसी तेज़ व महत्वाकांक्षा।

रावण का असली नाम और शिवभक्ति

रावण का जन्म नाम था दशग्रीव या दशानन,
जो उसके दस सिरों (ज्ञान, शक्ति और विद्या के प्रतीक) को दर्शाता था।
किंवदंती है कि भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उसने वर्षों तक कठोर तप किया।
तपस्या में उसने अपने सिर एक-एक कर शिव को अर्पित कर दिए।
जब शिव प्रसन्न हुए और उसे वरदान देकर पुनर्जीवित किया, तब उन्होंने कहा —

“तू वह है जिसने रुद्र को भी रुला दिया — तू ‘रावण’ कहलाएगा।”

⚔️ ब्राह्मण से राक्षस बनने की यात्रा

ज्ञान और शक्ति मिलने के बाद रावण ने ब्रह्मा से एक वरदान माँगा —
कि उसे न कोई देवता, न दानव, न यक्ष, न गंधर्व मार सके।
लेकिन उसने मनुष्य को तुच्छ समझकर उस सूची में शामिल नहीं किया।
यही उसकी सबसे बड़ी भूल थी।

शक्ति और वरदान ने रावण को अजेय बना दिया,
पर उसी के साथ उसमें अहंकार का बीज भी अंकुरित हो गया।
वह देवताओं, ऋषियों और यहाँ तक कि स्त्रियों तक का अपमान करने लगा।
त्रिलोक पर उसका अत्याचार बढ़ता गया —
और इसी अधर्म ने उसे ‘राक्षस’ बना दिया।

रावण का पौराणिक रहस्य — जया-विजया की कथा

पुराणों के अनुसार, रावण का जन्म केवल एक साधारण अवतार नहीं था।
वह वास्तव में भगवान विष्णु के द्वारपाल जया का दूसरा जन्म था।
सनकादिक ऋषियों के शाप से जया और विजय को तीन जन्मों तक असुर कुल में जन्म लेना पड़ा —

  • पहले जन्म में वे हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु,

  • दूसरे में रावण और कुंभकर्ण,

  • और तीसरे में शिशुपाल और दंतवक्र बने।

हर जन्म में उन्हें भगवान विष्णु के ही अवतार के हाथों मृत्यु प्राप्त हुई —
और इस तरह रावण की मृत्यु भी विष्णु के अवतार भगवान राम के हाथों निश्चित थी।

रावण की कथा का संदेश

रावण का जीवन यह सिखाता है कि ज्ञान और भक्ति के साथ यदि अहंकार जुड़ जाए,
तो सबसे महान व्यक्ति भी विनाश के मार्ग पर चला जाता है।
वह जितना विद्वान था, उतना ही अपने घमंड का शिकार भी हुआ।

दशहरे के दिन जब रावण दहन किया जाता है,
तो केवल उसका पुतला नहीं जलता —
बल्कि वह अहंकार, अधर्म और अन्याय के अंत का प्रतीक बन जाता है।