Category: सामाजिक

  • परदादा ब्रह्मा, पिता विश्रवा मुनि  — फिर कैसे राक्षस बना रावण?

    परदादा ब्रह्मा, पिता विश्रवा मुनि — फिर कैसे राक्षस बना रावण?

    रामायण का सबसे रहस्यमय और चर्चित चरित्र — रावण, आज भी लोगों के मन में जिज्ञासा और चर्चा का विषय है।
    एक ओर वह अत्यंत ज्ञानी, शास्त्रों का पंडित और भगवान शिव का भक्त था,
    तो दूसरी ओर उसका नाम अहंकार, अधर्म और विनाश का प्रतीक बन गया।
    आख़िर ऐसा क्या हुआ कि ब्रह्मा के वंशज और ऋषि पुत्र होते हुए भी रावण ‘राक्षस’ कहलाया?

    रावण का जन्म और वंश परंपरा

    रावण का जन्म ऋषि विश्रवा और कैकेसी के घर हुआ था।
    विश्रवा, महर्षि पुलस्त्य के पुत्र थे — इसलिए रावण का वंश ब्राह्मण कुल का था।
    वहीं कैकेसी राक्षस कुल के राजा सुमाली की पुत्री थीं।
    इसलिए रावण के स्वभाव में दोनों संस्कार मिले —
    पिता से ज्ञान और तपस्या की विरासत, और माता से राक्षसी तेज़ व महत्वाकांक्षा।

    रावण का असली नाम और शिवभक्ति

    रावण का जन्म नाम था दशग्रीव या दशानन,
    जो उसके दस सिरों (ज्ञान, शक्ति और विद्या के प्रतीक) को दर्शाता था।
    किंवदंती है कि भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उसने वर्षों तक कठोर तप किया।
    तपस्या में उसने अपने सिर एक-एक कर शिव को अर्पित कर दिए।
    जब शिव प्रसन्न हुए और उसे वरदान देकर पुनर्जीवित किया, तब उन्होंने कहा —

    “तू वह है जिसने रुद्र को भी रुला दिया — तू ‘रावण’ कहलाएगा।”

    ⚔️ ब्राह्मण से राक्षस बनने की यात्रा

    ज्ञान और शक्ति मिलने के बाद रावण ने ब्रह्मा से एक वरदान माँगा —
    कि उसे न कोई देवता, न दानव, न यक्ष, न गंधर्व मार सके।
    लेकिन उसने मनुष्य को तुच्छ समझकर उस सूची में शामिल नहीं किया।
    यही उसकी सबसे बड़ी भूल थी।

    शक्ति और वरदान ने रावण को अजेय बना दिया,
    पर उसी के साथ उसमें अहंकार का बीज भी अंकुरित हो गया।
    वह देवताओं, ऋषियों और यहाँ तक कि स्त्रियों तक का अपमान करने लगा।
    त्रिलोक पर उसका अत्याचार बढ़ता गया —
    और इसी अधर्म ने उसे ‘राक्षस’ बना दिया।

    रावण का पौराणिक रहस्य — जया-विजया की कथा

    पुराणों के अनुसार, रावण का जन्म केवल एक साधारण अवतार नहीं था।
    वह वास्तव में भगवान विष्णु के द्वारपाल जया का दूसरा जन्म था।
    सनकादिक ऋषियों के शाप से जया और विजय को तीन जन्मों तक असुर कुल में जन्म लेना पड़ा —

    • पहले जन्म में वे हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु,

    • दूसरे में रावण और कुंभकर्ण,

    • और तीसरे में शिशुपाल और दंतवक्र बने।

    हर जन्म में उन्हें भगवान विष्णु के ही अवतार के हाथों मृत्यु प्राप्त हुई —
    और इस तरह रावण की मृत्यु भी विष्णु के अवतार भगवान राम के हाथों निश्चित थी।

    रावण की कथा का संदेश

    रावण का जीवन यह सिखाता है कि ज्ञान और भक्ति के साथ यदि अहंकार जुड़ जाए,
    तो सबसे महान व्यक्ति भी विनाश के मार्ग पर चला जाता है।
    वह जितना विद्वान था, उतना ही अपने घमंड का शिकार भी हुआ।

    दशहरे के दिन जब रावण दहन किया जाता है,
    तो केवल उसका पुतला नहीं जलता —
    बल्कि वह अहंकार, अधर्म और अन्याय के अंत का प्रतीक बन जाता है।

  • एक सवाल, सवाल क्यों नहीं करते? सवाल करो, पूंछो – हिंदी कविता

    एक सवाल, सवाल क्यों नहीं करते? सवाल करो, पूंछो – हिंदी कविता

    यह कविता मुझे एक पुरानी किताब में मिली. अच्छी लगी तो पोस्ट कर दी. कृपया इस पर विचार जरूर करें.
    सिर्फ दूसरों की मन की बाते मत सुनिए. आपके मन में जो हो वो कहिये. सवाल करिये. पूँछिये, ऐसा क्यों है.

    Ask Questions

    जो हल चलाता है उसके हिस्से में सदा छप्पर ही क्यों आता है?
    जो गोदामों में गेहूं, सरसों भरता है, उसके कोठी बंगले क्यों बन जाते हैं?

    Ask Questions

    शहरों में खूब रौशनी है फिर गाँवों में अँधियारा क्यों है?
    शहरों में चौड़ी सड़के हैं, गाँवों में संकरी गालियां क्यों हैं?
    क्यों रामू, कमरू और हरिया शहर भागते हैं?

    Ask Questions

    पानी कम क्यों हो रहा है? जंगल कौन काट रहा है?
    कटे पेड़ कहाँ जा रहे हैं?

    गाँव के बच्चों का दूध कहाँ जा रहा है?
    आदमी – आदमी के बीच इतना फर्क क्यों है?

    Ask Questions

    कुछ की तोंद इतनी फूली क्यों है?
    हाड तोड़ मेहनत के बाद भी, बहुतों के पेट पिचके क्यों हैं?

    Ask Questions

    जो पत्थर काटते हैं, रिक्शा खींचते हैं, लोहा कूटते हैं,
    उन्हें साफ़ – सुथरे घरों में रहने का हक़ क्यों नहीं है?

    Ask Questions

    इतनी बड़ी दुनिया में कितनी चीजें हैं, कितनी घटनाएं हैं?
    सब कुछ जानने के लिए, सबके बारे में सवाल करो!!

    साभार: अनजान

  • कुंवारे लड़के इस मंदिर से चुरा ले जाते हैं माता पार्वती की मूर्ति को, साल में 1-2 महीने ही रह पाती हैं शिव जी के साथ

    कुंवारे लड़के इस मंदिर से चुरा ले जाते हैं माता पार्वती की मूर्ति को, साल में 1-2 महीने ही रह पाती हैं शिव जी के साथ

    माता पार्वती की मूर्ति चुराने का अजब कारण

    भारत में अनेक प्रकार की रीति रिवाज, परंपरा और मान्यताएं हैं। लेकिन राजस्थान में एक ऐसी मान्यता है कि जिसके बारे में जानकर आप हैरान रह जाएंगे। आज हम आपको एक ऐसी परंपरा के बारे में बताते हैं जिसमें शादी के लिए लोग मंदिर से मूर्ति की चोरी करते हैं। मान्यता है कि जिन लड़कों की शादी में कोई परेशानी आ रही है या फिर कुंडली दोष है तो वह मंदिर से माता पार्वती की मूर्ति चुरा ले जाए तो उसकी शादी हो जाती है।

    कमाल की बात तो यह है कि मूर्ति चोरी होने पर कोई पुलिस केस भी नहीं होता है। यूं तो शादी नहीं होने पर लोग भगवान और देवी-देवताओं की शरण में जाकर मन्नत मांगते हैं. लेकिन राजस्थान में एक ऐसा भी मंदिर है, जहां लोग इसके लिए मूर्ति चुराकर भागने का अनोखा तरीका अपनाते हैं. मान्यता है कि इस मंदिर से मूर्ति चुराते ही युवक की जल्द ही शादी हो जाती है. फिलहाल, सावन के आने पहले ही इस मंदिर में देवी की एक मूर्ति गायब है. स्थानीय लोगों का कहना है कि किसी कुंवारे ने मूर्ति को घर में छुपा रखा है.

    आइए जानते हैं इस मंदिर और परंपरा के बारे में..

    Shiv Parvati
    Shiv Parvati

    हो जाती है जल्द शादी

    यह अनोखा मंदिर राजस्थान के बूंदी जिले के हिंडोली कस्बे में स्थित है। यहां रामसागर झील किनारे रघुनाथ घाट मंदिर से अगर कोई कुंवारा लड़का माता पार्वती की मूर्ति चुरा ले जाए तो उसकी शादी जल्द हो जाती है।

    महीनों गायब रहती हैं माता पार्वती

    यही कारण है कि कुंवारे लड़के रात में चुपचाप मूर्ति उठा ले जाते हैं। इसी कारण शिव मंदिर में रहते हैं और माता पार्वती महीने भर तक गायब रहती हैं। सालभर में मुश्किल से एक महीने के लिए मूर्ति मंदिर में रहती है। मंदिर में महादेव (शिवलिंग) के बगल में ही पार्वतीजी की मूर्ति स्थापित है। पर महादेव जोड़े के साथ कम ही नजर आते हैं, क्योंकि कुंवारे पहले से ताक में रहते हैं। फिलहाल, सावन के पहले से पार्वतीजी महादेव से बिछुड़ी हुई हैं। वे किसी कुंवारे के घर होम क्वारैंटाइन में हैं।

    Shiv Parvati
    Shiv Parvati

    ऐसे में समय में भी ले गए मूर्ति

    आपको जानकर हैरानी होगी लॉकडाउन के समय में भी किसी ने मूर्ति को चुरा लिया है। कोरोना वायरस की वजह से लगे लॉकडाउन के चलते इस बार अक्षय तृतीया जैसे मुहूर्त पर भी शादियां नहीं हुईं। अगर लॉकडाउन नहीं टूटा तो शादियां भी नहीं होंगी और जुलाई से चार महीने के लिए देव सो जाएंगे।

    सालभर होती रहती है मूर्ति चोरीइस स्थिति में उम्मीद कम ही है कि महादेव के पास माता पार्वती वापस आ पाएंगी। स्थानिय पुजारी ने बताया है कि इस मंदिर में सालभर ऐसा होता रहता है। बहुत ही कम समय होता है कि मंदिर में शिव और पार्वती एकसाथ दर्शन देते हैं।

    Shiv Parvati
    Shiv Parvati

    नहीं होती पुलिस शिकायत

    पिछले 35 साल से मंदिर में पुजारी के रूप में सेवा दे रहे रामबाबू पाराशर बताते हैं कि अब तक 15-20 बार पार्वतीजी की मूर्ति चोरी हो चुकी है। चुराने वालों की शादियां भी हो चुकी हैं। हमें चोरी का पता चल भी जाता है तो भी किसी को टोकते नहीं। चुराई हुई मूर्ति महीनों तक छिपाकर रख देते हैं और संयोग यह है कि सभी चुराने वाले कुंवारों की शादियों भी हो चुकी हैं। साथ ही इस परंपरा के तहत कोई भी पुलिस से शिकायत दर्ज नहीं करता।

    Shiv Parvati
    Shiv Parvati

    इस बार करना पड़ सकता है इंतजार

    मंदिर में मूर्ति चुराने का कार्य अधिकतर रात के समय अंधेरे में किया जाता है। शादी के बाद जब मूर्ति वापस मंदिर में आ जाती है, उसके बाद कोई दुसरा कुंवारा लड़का मूर्ति को चुरा ले जाता है। कतार में लगे कुंवारों को इस बार लंबा इंतजार करना पड़ सकता है।”

     

    Source: https://navbharattimes.indiatimes.com/astro/photo/unmarried-boys-steal-the-murti-of-mata-parvati-from-this-temple-78508/6/

  • जगन्नाथ मंदिर 25 जुलाई को जनता के लिए खुलेगा

    जगन्नाथ मंदिर 25 जुलाई को जनता के लिए खुलेगा

    पुरी, 16 जून (भाषा) पुरी का प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर 25 जुलाई को जनता के लिए खुलेगा। यह जानकारी प्राधिकारियों ने बुधवार को दी।

    मुख्य प्रशासक कृष्ण कुमार ने कहा कि यह निर्णय श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (एसजेटीए) की बैठक में लिया गया। उन्होंने कहा कि मंदिर 15 जून तक भक्तों के लिए बंद था, जिसे 25 जुलाई तक बढ़ा दिया गया।

    रथ यात्रा उत्सव पूरा होने के दो दिन बाद मंदिर जनता के लिए खुलेगा।

    भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ 23 जुलाई को नौ दिवसीय रथयात्रा उत्सव के बाद मंदिर लौटेंगे।

    उन्होंने कहा, ‘‘भक्तों को दो दिन बाद मंदिर में प्रवेश करने का अवसर मिलेगा।’’

    कुमार ने कहा कि हालांकि, एसजेटीए 24 या 25 जुलाई को फिर से बैठक करेगा और मौजूदा स्थिति के आधार पर जनता को अनुमति देने पर फैसला करेगा।

    24 जून को स्नान यात्रा (स्नान उत्सव) और 12 जुलाई को रथ यात्रा राज्य सरकार के निर्णय के अनुसार भक्तों के बिना, कोविड-19 दिशानिर्देशों के पालन के साथ आयोजित की जाएगी।

    कुमार ने कहा कि रथ यात्रा सुरक्षा कर्मियों की मौजूदगी में सेवादारों की भागीदारी से होगी।

    उन्होंने कहा कि उत्सव में भाग लेने वाले सेवकों को टीकाकरण की दोनों खुराकों का प्रमाण पत्र या कोविड निगेटिव रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।

    जिलाधिकारी समर्थ वर्मा ने कहा कि त्योहार के दौरान पुरी में निषेधाज्ञा लागू की जाएगी।

    एसजेटीए ने एक अलग बैठक में जगन्नाथ मंदिर में आठ दरवाजों पर चांदी की परत चढ़ाने के लिए दो समितियों का गठन करने का भी निर्णय लिया। उनमें से एक तकनीकी समिति होगी और दूसरी सेवादारों का प्रतिनिधित्व करेगी।

     

    कुमार ने कहा कि एक दानदाता चांदी प्रदान करेगा। कुमार ने कहा कि लगभग दो टन धातु का उपयोग होने की संभावना है।

    पीटीआई-भाषा संवाददाता

    डिसक्लेमर: यह आर्टिकल भाषा पीटीआई न्यूज फीड से सीधे प्रकाशित किया गया है.

  • पाकिस्तान कैबिनेट ने बलात्कारियों को नपुंसक करने को मंजूरी दी

    पाकिस्तान कैबिनेट ने बलात्कारियों को नपुंसक करने को मंजूरी दी

    पाकिस्तान की कैबिनेट ने शुक्रवार को बलात्कार विरोधी दो अध्यादेशों को मंजूरी दे दी है जिसमें दोषी की सहमति से बलात्कारियों को रासायनिक रूप से बधिया करने और बलात्कार के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन को मंजूरी दी गयी है। एक मीडिया रिपोर्ट से यह जानकारी मिली।

    रासायनिक बधिया या केमिकल कास्ट्रेशन एक रासायनिक प्रक्रिया है जिससे व्यक्ति के शरीर में रसायनों की मदद से एक निश्चित अवधि या हमेशा के लिए यौन उत्तेजना कम या खत्म की जा सकती है।

    डॉन न्यूज की खबर के मुताबिक, बृहस्पतिवार को संघीय कानून मंत्री फारूक नसीम की अध्यक्षता में विधि मामलों पर कैबिनेट समिति की बैठक में बलात्कार विरोधी (जांच और सुनवाई) अध्यादेश 2020 और आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश 2020 को मंजूरी दी गई। मंगलवार को संघीय कैबिनेट ने अध्यादेशों को सैद्धांतिक रूप से मंजूरी दे दी थी।

    पहली बार अपराध करने वाले या अपराध दोहराने वाले अपराधियों के लिए रासायनिक बधियाकरण को पुनर्वास के उपाय के तरह माना जाएगा और इसके लिए दोषी की सहमति ली जाएगी।

    कानून मंत्री नसीम के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत बधिया करने से पहले दोषी की सहमति लेना अनिवार्य है।

    उन्होंने कहा कि यदि सहमति लिए बिना रासायनिक बधियाकरण का आदेश दिया जाता है तो दोषी आदेश को अदालत के समक्ष चुनौती दे सकता है।

    मंत्री ने कहा कि अगर कोई दोषी बधिया करने के लिए सहमत नहीं होगा तो उस पर पाकिस्तान दंड संहिता (पीपीसी) के अनुसार कार्रवाई की जाएगी जिसके तहत अदालत उसे मौत की सजा, आजीवन कारावास या 25 साल की जेल की सजा दे सकती है।

    उन्होंने कहा कि सजा का फैसला अदालत पर निर्भर करता है। न्यायाधीश रासायनिक बधियाकरण या पीपीसी के तहत सजा का आदेश दे सकते हैं।

    नसीम ने कहा कि अदालत सीमित अवधि या जीवनकाल के लिए बधिया का आदेश दे सकती है ।

    अध्यादेशों में बलात्कार के मामलों में सुनवाई कराने के लिए विशेष अदालतों के गठन का भी प्रावधान है। विशेष अदालतों के लिए विशेष अभियोजकों की भी नियुक्ति की जाएगी।

    प्रस्तावित कानूनों के अनुसार, एक आयुक्त या उपायुक्त की अध्यक्षता में बलात्कार विरोधी प्रकोष्ठों का गठन किया जाएगा ताकि प्राथमिकी, चिकित्सा जांच और फोरेंसिक जांच का शीघ्र पंजीकरण सुनिश्चित किया जा सके।

    इसमें आरोपी द्वारा बलात्कार पीड़ित से जिरह पर भी रोक लगा दी गई है। केवल जज और आरोपी के वकील ही पीड़ित से जिरह कर सकेंगे।

    डिसक्लेमर: टाइटल को छोड़कर यह आर्टिकल भाषा – पीटीआई न्यूज फीड से सीधे प्रकाशित किया गया है.

    Image Credits: Live Law

  • मेरी नौकरी मेरा काम, छूट गया मेरा वोट, मेरी पहचान – पेटिशन साइन करें

    मेरी नौकरी मेरा काम, छूट गया मेरा वोट, मेरी पहचान – पेटिशन साइन करें

    बहुत साल हो गए, मैं कालेज करने दूसरे शहर गया. फिर प्राइवेट नौकरी करने कभी दिल्ली तो कभी गुरुग्राम, कभी सूरत तो कभी मुंबई या फिर नॉएडा या बंगलोर. समय बदला काफी कुछ डिजिटल हो गया.

    एक देश एक पहचान हो गयी. आधार कार्ड बना जो मोबाइल से लेकर पैन कार्ड और बैंक अकाउंट से जुड़ गया. देश में रोमिंग ख़त्म हो गयी और मेरा एक मोबाइल अब पुरे देश में मेरे साथ सफर करने लगा. बैंक अकाउंट ऑनलाइन हुए तो मैं कहीं से भी पैसा ट्रांसफर करने लगा भले ही मेरा खाता मेरे गाँव का ही क्यों न हो. मैं उसी पुराने पैन कार्ड से इनकम टैक्स भरने लगा जो मेरे गाँव से बना था. अब तो पासपोर्ट का वेरिफिकेशन भी उसी शहर में होने लगा जहां मैं नौकरी कर रहा हूँ.

    सब कुछ मोबाइल हो गया लेकिन एक चीज मोबाइल नहीं हुई वो है हमारा और आपका वोट. इस एक वोट को मोबाइल न करने की वजह से करोडो लोग भारतीय संविधान के मतदान के अधिकार से वंचित रह जाते हैं.


    पोस्टल बैलट है पर केवल सरकारी नौकरी वालों के लिए. NRI जो विदेशों में रह रहे हैं वो भी प्रॉक्सी वोटिंग से वोट कर सकते हैं, जबकि इनकी संख्या गिनी चुनी है.


    Mobile Votes Petition - Lost My Vote Due to My Job

    करोडो लोग पढाई लिखाई और नौकरी के चक्कर में अपना घर छोड़ देते है जो छुट्टी न मिलने या महगे किराए के चलते अपना वोट डालने नहीं आ पाते हैं. क्या उनके लिए “मेरा वोट मेरा अधिकार” नहीं है. इन जैसे लोगो के वोट न देने की वजह से मतदान प्रतिशत 50 – 60 प्रतिशत रहता है और कुल वोट का 20 से 25 प्रतिशत वोट पाकर लोग माननीय बन जाते हैं.


    2014 के आम चुनाव में 81.45 करोड़ मतदाता लिस्ट में थे जिसमे 2.31 करोड़ matdaata 18 -19 साल के थे. इस चुनाव में वोट प्रतिशत था 66.38% जो अब तक का सर्वाधिक मतदान है जिसमे NDA (भाजपा गठबंधन जिसमे भाजपा ने 31.3% वोट पाकर 282 सीट जीती) ने 38.5% वोट पाकर 336 सीटें जीतीं. लेकिन ध्यान देने वाली बात ये है की जितने वोट भाजपा गठबंधन को मिले थे लगभग उतने ही 28.1 करोड़ लोगों ने वोट नहीं किया था.


    Mobile Votes Petition - Lost My Vote Due to My Job

    क्यों? इतने लोगों ने वोट क्यों नहीं किया?

    कहा जाता है की इतने लोग वोट करने घरों से नहीं निकले जबकि इनमे से ज्यादातर लोग तो घरों पर थे ही नहीं. वो अपनी रोजी-रोटी के चक्कर में किसी और राज्य या किसी और शहर में थे. सिर्फ एक नियम की वजह से की आपको वोट डालने के लिए आपको खुद वोट डालने उस बूथ पर जाना पड़ेगा जहां पर आपका वोट है.

    इतनी बड़ी  गिनती को आप नजरअंदाज नहीं कर सकते.

    इसलिए हम सबको अपने वोटिंग के अधिकार को मोबाइल करने के लिए इस टाइम्स ऑफ़ इंडिया की इस पेटिशन पर साइन करें ताकि चुनाव आयोग हमारे वोट को वहाँ भी डालने की अनुमति प्रदान करे जहां हम प्राइवेट नौकरी कर रहे हैं.

    Click here to register your vote: https://timesofindia.indiatimes.com/Lost-Votes/lost-votes/campaignlanding/67346592.cms

  • राजधानी दिल्ली का सिग्नेचर ब्रिज चालू, जानिए पांच दिलचस्प बातें

    राजधानी दिल्ली का सिग्नेचर ब्रिज चालू, जानिए पांच दिलचस्प बातें

    राजधानी दिल्ली के बहुप्रतीक्षित सिग्नेचर ब्रिज का करीब 14 वर्ष के लंबे इंतजार के बाद रविवार को उद्घाटन कर दिया गया। इसे बनाए जाने की घोषणा साल 2004 में दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार के वक्त हुई थी और इसका उद्घाटन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने किया।

    यमुना नदी के ऊपर बने इस ब्रिज से उत्तर और उत्तर-पूर्वी दिल्ली के बीच सफर करनेवाले लोगों की समय में बचत होगी। इसके साथ ही, वजीराबाद पुल के ऊपर ट्रैफिक का बोझ भी कम होगा।

    उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने इससे पहले कहा था- “पेरिस के एफिल टावर की तरफ सिग्नेचर ब्रिज के टॉप से शहर के विशाल दृश्य को देखकर एंज्वॉय किया जा सकेगा। चार एलिवेटर्स के जरिए विजिटर्स को ब्रिज के टॉप पर ले जाया जा सकेगा, जिसकी कुल क्षमता 50 लोगों की होगी।”

     

     

    आइये जानते हैं दिल्ली के आइकोनिक सिग्नेचर ब्रिच की पांच बड़ी खासियत-

    1-यह सिग्नेचर ब्रिज ‘नमस्ते’ के रूप में दिखते हुए देश का पहला केबल स्टाइल ब्रिज है। दूसरे चरण में इस ब्रिज को पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित किया जाएगा।
    2-ब्रिज के ऊपर ग्राफिक्स आधुनिक और प्रगतिशील भारत को प्रदर्शित कर रहा है। ब्रिज पर 154 मीटर हाई ग्लास व्यूइंग बॉक्स है जो कुतुब मीनार की ऊंचाई से करीब दोगुनी है। 575 मीटर लंबा यह ब्रिज सेल्फी स्पॉट भी होगा।
    3-आठ लेन की यह सिग्नेचर ब्रिज वजीराबाद रोड को आउटर रिंग रोड से जोड़ता है। जिससे गाजियाबाद की तरफ जानेवालों को कम से कम 30 मिनट का समय बचेगा।
    4-सिग्नेचर ब्रिज के मुख्य पिलर की ऊंचाई 154 मीटर है। ब्रिज पर 19 स्टे केबल्स हैं, जिन पर ब्रिज का 350 मीटर भाग बगैर किसी पिलर के रोका गया है। पिलर के ऊपरी भाग में चारों तरफ शीशे लगाए गए हैं।
    5-यह ब्रिज यहां के आसपास की अर्थव्यवस्था को रफ्तार देगा क्योंकि इसे देखने के ले न सिर्फ एनसीआर और देशभर से बल्कि दुनियाभर के लोग आएंग। इसका निश्चित तौर पर सामाजिक-सांस्कृतिक असर होगा।

    https://youtu.be/sgf-lZvT2pw

     

    Source: Signature Bridge

  • कैसे हुई थी राधा की मृत्यु, श्रीकृष्ण ने क्यों तोड़ दी थी बांसुरी?

    कैसे हुई थी राधा की मृत्यु, श्रीकृष्ण ने क्यों तोड़ दी थी बांसुरी?

    जब भी प्रेम की मिसाल दी जाती है तो श्रीकृष्ण-राधा के प्रेम की मिसाल सबसे पहले आती है. राधा-श्रीकृष्ण के प्रेम को जीवात्मा और परमात्मा का मिलन कहा जाता है. राधा श्रीकृष्ण का बचपन का प्यार थीं. श्रीकृष्ण जब 8 साल के थे तब दोनों ने प्रेम की अनुभूति की. राधा श्रीकृष्ण के दैवीय गुणों से परिचित थीं. उन्होंने जिंदगी भर अपने मन में प्रेम की स्मृतियों को बनाए रखा. यही उनके रिश्ते की सबसे बड़ी खूबसूरती है.

     

    कहा जाता है कि श्रीकृष्ण को केवल दो ही चीजें सबसे ज्यादा प्रिय थीं. ये दोनों चीजें भी आपस में एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई थीं- बांसुरी और राधा.

    How Radha Died and Why Krishna Broken his Flute

    कृष्ण की बांसुरी की धुन ही थी जिससे राधा श्रीकृष्ण की तरफ खिंची चली गईं. राधा की वजह से श्रीकृष्ण बांसुरी को हमेशा अपने पास ही रखते थे.

     

    भले ही श्रीकृष्ण और राधा का मिलन नहीं हो सका लेकिन उनकी बांसुरी उन्हें हमेशा एक सूत्र में बांधे रही.

    How Radha Died and Why Krishna Broken his Flute

    श्रीकृष्ण के जितने भी चित्रण मिलते हैं, उनमें बांसुरी जरूर रहती है. बांसुरी श्रीकृष्ण के राधा के प्रति प्रेम का प्रतीक है. वैसे तो राधा से जुड़ीं कई अलग-अलग विवरण मौजूद हैं लेकिन एक प्रचलित कहानी नीचे दी गई है.

     

    भगवान श्रीकृष्ण से राधा पहली बार तब अलग हुईं जब मामा कंस ने बलराम और कृष्ण को आमंत्रित किया. वृंदावन के लोग यह खबर सुनकर दुखी हो गए.

    How Radha Died and Why Krishna Broken his Flute

    मथुरा जाने से पहले श्रीकृष्ण राधा से मिले थे. राधा, कृष्ण के मन में चल रही हर गतिविधि को जानती थीं. राधा को अलविदा कह कृष्ण उनसे दूर चले गए.

     

    कृष्ण राधा से ये वादा करके गए थे कि वो वापस आएंगे. लेकिन कृष्ण राधा के पास वापस नहीं आए. उनकी शादी भी रुक्मिनी से हुई. रुक्मिनी ने भी श्रीकृष्ण को पाने के लिए बहुत जतन किए थे. श्रीकृष्ण से विवाह के लिए वह अपने भाई रुकमी के खिलाफ चली गईं. राधा की तरह वह भी श्रीकृष्ण से प्यार करती थीं, रुक्मिनी ने श्रीकृष्ण को एक प्रेम पत्र भी भेजा था कि वह आकर उन्हें अपने साथ ले जाएं. इसके बाद ही कृष्ण रुक्मिनी के पास गए और उनसे शादी कर ली.

    How Radha Died and Why Krishna Broken his Flute

    कृष्ण के वृंदावन छोड़ने के बाद से ही राधा का वर्णन बहुत कम हो गया. राधा और कृष्ण जब आखिरी बार मिले थे तो राधा ने कृष्ण से कहा था कि भले ही वो उनसे दूर जा रहे हैं, लेकिन मन से कृष्ण हमेशा उनके साथ ही रहेंगे. इसके बाद कृष्ण मथुरा गए और कंस और बाकी राक्षसों को मारने का अपना काम पूरा किया. इसके बाद प्रजा की रक्षा के लिए कृष्ण द्वारका चले गए और द्वारकाधीश के नाम से लोकप्रिय हुए.

    How Radha Died and Why Krishna Broken his Flute

    जब कृष्ण वृंदावन से निकल गए तब राधा की जिंदगी ने अलग ही मोड़ ले लिया था. राधा की शादी एक यादव से हो गई. राधा ने अपने दांपत्य जीवन की सारी रस्में निभाईं और बूढ़ी हुईं, लेकिन उनका मन तब भी कृष्ण के लिए समर्पित था.

     

    राधा ने पत्नी के तौर पर अपने सारे कर्तव्य पूरे किए. दूसरी तरफ श्रीकृष्ण ने अपने दैवीय कर्तव्य निभाए.

    How Radha Died and Why Krishna Broken his Flute

    सारे कर्तव्यों से मुक्त होने के बाद राधा आखिरी बार अपने प्रियतम कृष्ण से मिलने गईं. जब वह द्वारका पहुंचीं तो उन्होंने कृष्ण की रुक्मिनी और सत्यभामा से विवाह के बारे में सुना लेकिन वह दुखी नहीं हुईं.

     

    जब कृष्ण ने राधा को देखा तो बहुत प्रसन्न हुए. दोनों संकेतों की भाषा में एक दूसरे से काफी देर तक बातें करते रहे. राधा जी को कान्हा की नगरी द्वारिका में कोई नहीं पहचानता था. राधा के अनुरोध पर कृष्ण ने उन्हें महल में एक देविका के रूप में नियुक्त किया.

    How Radha Died and Why Krishna Broken his Flute

    राधा दिन भर महल में रहती थीं और महल से जुड़े कार्य देखती थीं. मौका मिलते ही वह कृष्ण के दर्शन कर लेती थीं. लेकिन महल में राधा ने श्रीकृष्ण के साथ पहले की तरह का आध्यात्मिक जुड़ाव महसूस नहीं कर पा रही थीं इसलिए राधा ने महल से दूर जाना तय किया. उन्होंने सोचा कि वह दूर जाकर दोबारा श्रीकृष्ण के साथ गहरा आत्मीय संबंध स्थापित कर पाएंगी.

    How Radha Died and Why Krishna Broken his Flute

    उन्हें नहीं पता था कि वह कहां जा रही हैं, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण जानते थे. धीरे-धीरे समय बीता और राधा बिलकुल अकेली और कमजोर हो गईं. उस वक्त उन्हें भगवान श्रीकृष्ण की आवश्यकता पड़ी. आखिरी समय में भगवान श्रीकृष्ण उनके सामने आ गए.

     

    कृष्ण ने राधा से कहा कि वह उनसे कुछ मांगें, लेकिन राधा ने मना कर दिया. कृष्ण के दोबारा अनुरोध करने पर राधा ने कहा कि वह आखिरी बार उन्हें बांसुरी बजाते देखना चाहती हैं. श्रीकृष्ण ने बांसुरी ली और बेहद सुरीली धुन में बजाने लगे.

    How Radha Died and Why Krishna Broken his Flute

    श्रीकृष्ण ने दिन-रात बांसुरी बजाई, जब तक राधा आध्यात्मिक रूप से कृष्ण में विलीन नहीं हो गईं. बांसुरी की धुन सुनते-सुनते राधा ने अपने शरीर का त्याग कर दिया.

     

    हालांकि भगवान कृष्ण जानते थे कि उनका प्रेम अमर है, बावजूद वे राधा की मृत्यु को बर्दाश्त नहीं कर सके. कृष्ण ने प्रेम के प्रतीकात्मक अंत के रूप में बांसुरी तोड़कर झाड़ी में फेंक दी. उसके बाद से श्री कृष्ण ने जीवन भर बांसुरी या कोई अन्य वादक यंत्र नहीं बजाया.

    How Radha Died and Why Krishna Broken his Flute

    कहा जाता है कि जब द्वापर युग में नारायण ने श्री कृष्ण का जन्म लिया था, तब मां लक्ष्मी ने राधा रानी के रूप में जन्म लिया था ताकि मृत्यु लोक में भी वे उनके साथ ही रहे.

     

    Source: Shri Krishna and Radha

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  • कैलास मानसरोवर के इन 7 रहस्यों को कोई जान नहीं पाया, कौन बजाता है यहां मृदंग

    कैलास मानसरोवर के इन 7 रहस्यों को कोई जान नहीं पाया, कौन बजाता है यहां मृदंग

    दुनिया के सबसे ऊंचे शिवधाम कैलास मानसरोवर (Kailash Mansarovar) की यात्रा इन दिनों कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कर रहे हैं और इन्होंने अपनी इस यात्रा को लेकर ट्वीट किया है और बताया है कि कैलास आने का सौभाग्य उसे ही मिलता है जिसे कैलास बुलाते हैं। राहुल गांधी ने यहां स्थित मानसरोवर झील के बारे में लिखा है कि; मानसरोवर झील का पानी बेहद शांत, स्थिर और कोमल है। यह झील सबकुछ देती है और कुछ नहीं लेती। इसे कोई भी ग्रहण कर सकता है। यहां कोई घृणा नहीं है। इसलिए भारत में इस जल को पूजा जाता है। आइए जानें पुराणों में कैलास मानसरोवर झील के बारे में क्या कहा गया है और क्यों लोग जान जोखिम में डालकर यहां यात्रा करने आते हैं।

    Kailash Mansarovar Yatra

    पर्वतारोहियों ने दुनिया की सबसे ऊंची छोटी, माउन्ट एवरेस्ट को फतह कर लिया लेकिन आज तक कोई भी पर्वतारोही कैलाश पर्वत पर नहीं चढ़ सका है। ऐसी बहुत सी अनोखी बाते हैं कैलाश के बारे में:

     

    मृदंग की आती है आवाजें:

    Kailash Mansarovar Yatra

    कहा जाता है कि गर्मी के दिनों में जब मानसरोवर की बर्फ पिघलती है तो एक प्रकार की आवाज लगातार सुनाई देती है। श्रद्धालुओं का मानना है कि यह आवाज मृदंग की ध्वनि जैसी होती है। मान्यता यह भी है कि कोई व्यक्ति मानसरोवर में एक बार डुबकी लगा ले तो वह ‘रुद्रलोक’ को प्राप्त होता है।

     

    शक्तिपीठ के होते हैं दर्शन:

    Kailash Mansarovar Yatra

    इस स्थान की गिनती देवी के 51 शक्ति पीठों में भी होती है। माना जाता है कि देवी सती का दांया हाथ इसी स्थान पर गिरा था, जिससे यह झील तैयार हुई। इसलिए यहां एक पाषाण शिला को उसका रूप मानकर पूजा जाता है।

    Kailash Mansarovar Yatra

    ॐ की आवाज देती है सुनाई:

     

    मान्यता है कि मानसरोवर झील और राक्षस झील, ये दोनों झीलें सौर और चंद्र बल को प्रदर्शित करती हैं, जिसका संबंध सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा से है। जब आप इन्हें दक्षिण की तरफ से देखेंगे तो एक स्वास्तिक चिह्न बना हुआ दिखेगा। इस अलौकिक जगह पर प्रकाश तरंगों और ध्वनि तरंगों का समागम होता है, जो ‘ॐ’ जैसा सुनाई देता है।

    Kailash Mansarovar Yatra

    इसे महसूस कर सकते हैं:

     

    आपमानसरोवर में बहुत-सी खास बातें आपके आसपास होती रहती हैं, जिन्हें आप केवल महसूस कर सकते हैं। झील लगभग 320 किलोमीटर के क्षेत्र में फैली हुई है। इस झील के आस-पास सुबह के 2:30 से 3:45 बजे के बीच कई तरह की अलौकिक क्रियाओं को केवल महसूस किया जा सकता है, देखा नहीं जा सकता।

    Kailash Mansarovar Yatra

    गंगा में जाता है इसका पानी:

    Kailash Mansarovar Yatra

    मान्यता है कि इस सरोवर का जल आंतरिक स्रोतों के माध्यम से गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी में जाता है। पुराणों के अनुसार, शंकर भगवान द्वारा प्रकट किए गए जल के वेग से जो झील बनी, उसी का नाम मानसरोवर हुआ था।

    Kailash Mansarovar Yatra

    क्षीर सागर से है इसका संबंध:

    Kailash Mansarovar Yatra

    मानसरोवर पहाड़ों से आते हुए रास्ते में एक झील है, पुराणों में इस झील का जिक्र ‘क्षीर सागर’ से किया गया है। क्षीर सागर कैलाश से 40 किमी की दूरी पर है। धार्मिक आस्था है कि विष्णु और माता लक्ष्मी इसी में शेष शैय्या पर विराजते हैं।

     

    Source: https://navbharattimes.indiatimes.com/astro/dharam-karam/religion-and-spiritualism/kailash-mansarovar-start-from-june-8-know-7-interesting-fact-of-mansarovar-yatra-30288/6/

  • भारत के 8 बेजोड़ गुरु, ऐसे चेले बनाए दुनिया हमेशा रखेगी याद

    भारत के 8 बेजोड़ गुरु, ऐसे चेले बनाए दुनिया हमेशा रखेगी याद

    भारतीय परंपरा में गुरु को गोविंद से बढ़कर आदर दिया गया है। इसकी वजह यह है कि गुरु अपने शिष्यों को सांचे में ढालकर एक ऐसा मनुष्य तैयार करने की क्षमता रखता है जो ईश्वर की बनाई सृष्टि को नई दिशा दे सकता है और अपनी अमर कीर्ति से इतिहास के पन्नों में अपना नाम अंकित कर सकता है। शिक्षक दिवस के अवसर पर हम आपको ऐसे ही कुछ गुरुओं की याद दिलाते हैं जिनके शिष्यों के नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं।

    शिव:

     

    सृष्टि में सबसे पहले गुरु भगवान शिव ही माने जाते हैं। इन्होंने पूरी दुनिया को नृत्य, व्याकरण और संगीत का ज्ञान दिया। इनके प्रमुख शिष्यों में शनि महाराज, परशुरामजी का नाम आता है। शनि महाराज नवग्रहों में दंडाधिकारी हैं और इनके न्याय से भगवान शिव भी नहीं बच पाए हैं। परशुरामजी ने भगवान शिव से ज्ञान प्राप्त करके गुरु शिष्य परंपरा को आगे चलाया। इनके कई शिष्यों के नाम इतिहास में अंकित हैं।

    वशिष्ठः

     

    भगवान राम ने अपने तीनों भाईयों के साथ इनसे ज्ञान प्राप्त किया था। इन्होंने भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम और अन्य भाईयों को धर्म की राह पर चलना सिखाया था।

    संदीपिनीः

     

    दुनिया को गीता का ज्ञान देने वाले भगवान श्रीकृष्ण को इन्होंने ज्ञान दिया था। इन्हीं के आश्रम में सुदामाजी और श्रीकृष्ण ने शिक्षा पाई थी। इन्ही के आश्रम में श्रीकृष्ण को परशुरामजी से सुदर्शन चक्र प्राप्त हुआ था।

    परशुरामः

     

    गुरु परंपरा में परशुरामजी का नाम बहुत ही आदर से लिया जाता है। इनके शिष्यों में ऐसे महायोद्धा हुए जिनसे देवता भी भयभीत रहते थे। महाभारत के महायुद्ध में इनके तीन शिष्यों भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण ने भाग लिया था। ये तीनों ही कौरवों के प्रधान सेनापति हुए और छल द्वारा युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए।

    द्रोणाचार्यः

     

    महाभारत की कथा इनके बिना अधूरी है। इन्होंने परशुरामजी से प्राप्त ज्ञान को गुरु परंपरा के तहत आगे बढ़ाया। इनके प्रमुख शिष्यों में कौरव, पांडव और अश्वत्थामा का नाम आता है। अर्जुन इनका प्रिय शिष्य था।

    श्रीकृष्णः

     

    महाभारत का एक महायोद्धा जिसने महज 16 साल की उम्र में अकेले ही पूरी कौरव सेना के महायोद्धाओं से युद्ध किया और अपनी वीरता से सभी को हैरान कर दिया उस वीर का नाम अभिमन्यु था। इस योद्धा के गुरु इनके मामा भगवान श्रीकृष्ण थे। महाभारत के महायुद्ध का परिणाम कुछ और होता अगर यह योद्धा उस युद्ध में नहीं होता।चक्रव्यूह को तोड़ना अर्जुन, श्रीकृष्ण और अभिमन्यु के अलावा किसी और को नहीं आता था। द्रोणाचार्य चक्रव्यूह में फंसाकर युधिष्ठिर को बंदी बना लेना चाहते थे लेकिन अभिमन्यु ने द्रोणाचार्य की चाल को नाकाम बना दिया। जब अकेले इन्हें कोई परास्त नहीं कर पा रहा था तब सभी ने एक साथ मिलकर इन पर वार करना शुरू कर दिया और अंत में वीरगति को प्राप्त हुआ।

    गोविंद भगवत्पाद:

     

    आदिगुरु शंकराचार्य जिन्होंने चार धामों की स्थापना की उनके गुरु गोविंद भगवत्पादजी थे। शंकराचार्यजी ने इनसे ज्ञान प्राप्त करके अद्वैत सिद्धांत का प्रचार किया और अपने समकालीन सभी विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित किया। वेदांतसूत्रों और उपनिषदों पर इनकी टिकाएं काफी प्रसिद्ध हैं।

    रामकृष्ण परमहंस:

     

    आधुनिक युग के प्रमुख संतों और दार्शनिकों में एक नाम आता है स्वामी विवेकानंदजी का जिन्होंने अपने सिद्धांत और ज्ञान से पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन कर दिखाया था। इनके गुरु थे रामकृष्ण परमहंस। इनके सानिध्य और ज्ञान से विवेकानंद जगत प्रसिद्ध हुए।

     

    Source: https://navbharattimes.indiatimes.com/astro/photo/teachers-day-special-teachers-in-mythology-47168/8/